जागरण संवाददाता, बरेली : स्वस्थ जीवन के लिए पूर्वजों ने हमें आयुर्वेद चिकित्सा का खजाना दिया लेकिन, हमने उसे नकार दिया। पश्चिमी चिकित्सा पद्धति के गुलाम होते चले गए। इस साल जिस डॉक्टर को उनकी खोज के लिए नोबल प्राइज मिला है, आयुर्वेद में उस उपचार का तरीका दशकों पहले लिखा चुका था। लिहाजा, हमें आयुर्वेद चिकित्सा पर भरोसा करके इसका प्रचार-प्रसार करने की जरूरत है। नियमित शोध, औषधीय वनस्पतियों को पहचाने की जरूरत है। रविवार को एमजेपी रुहेलखंड विश्वविद्यालय में आयुर्वेद के राष्ट्रीय सेमिनार में केजीएमयू के कुलपति प्रो. एमएलबी भट्ट ने यह कहा।

प्रो. भट्ट ने समाज को सेहत का आईना दिखाते हुए कहा कि आज करीब 80 फीसद लोगों में विटामिन-डी की कमी है। जबकि सर्दी में 40 दिन तक रोजाना 40 मिनट तक सुबह सूरज की धूप सेकने से शरीर सालभर की विटामिन-डी जमा कर लेता है। ड्रग्स, लत, अवसाद से लेकर अमूमन हर मर्ज का इलाज आयुर्वेद में है। बशर्ते हम उन औषधियों को जानें। आयुर्वेद के विद्यार्थी लगातार शोध करें। औषधीय वनस्पति तलाशें क्योंकि भारत में पांच हजार से ज्यादा औषधीय पौधे पाए जाते हैं। अफसोस जताते हुए कहा कि आज हमारे शिक्षण संस्थान भी आयुर्वेद को लेकर उतने संजीदा नहीं हैं, जितनी यह कारगर है।

उन्होंने स्वच्छता अभियान, खुले में शौच मुक्त समाज को दुनिया का सबसे जरूरी और बड़ा अभियान माना। बोले कि देश में प्यूरीफाइड वाटर पीने वालों को स्वच्छ जल नहीं मिलता। जितनी गहराई से पानी मिलेगा वह स्वच्छ होगा। उसे स्वच्छ करने के लिए मिट्टी के बर्तन में रखें। प्यूरीफाइड वाटर से कहीं ज्यादा फायदेमंद होगा। आरोग्य भारती की ओर से आयोजित सेमिनार में रुविवि के कुलपति प्रोफेसर अनिल शुक्ल ने विद्यार्थियों को ज्ञान की खोज का संदेश दिया। इस दौरान, बरेली आयुर्वेद कॉलेज के प्राचार्य प्रो. दिनेश कुमार मौर्य, पीलीभीत आयुर्वेद कॉलेज के प्राचार्य प्रो. राकेश कुमार तिवारी, डॉ. अतुल वाष्र्णेय आदि मौजूद रहे।

क्षेत्रीय सब्जी और फल खाएं

मुख्य वक्ता डॉ. अशोक भारती ने कहा कि दूसरे देशों के फल खाने के बजाय अपनी क्षेत्रीय सब्जी, फल खाएं। जलवायु की वजह से वह ज्यादा आपके शरीर के लिए फायदेमंद हैं।

Posted By: Jagran

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