जेएनएन, बरेली : दीपावली यानी दीपों की जगमग। खुशियों का इजहार आतिशबाजी के साथ। अनार, फुलझड़ी की रोशनी के पर्दे हटाकर जरा गरीबों की तरफ झांककर देखें। नजर आएगी बेबसी, जरूरतों और उम्मीदों के झंझावतों में उलझी जिंदगियां। और हम महज चंद क्षण के आनंद के लिए 25 करोड़ से ज्यादा की आतिशबाजी फूंक डालते हैं। इतने रुपयों से गरीबों के साथ खुशियां बांट सकते हैं। संकल्प लें उन गरीब बच्चों को भी खिलौने, मिठाई, कपड़े बांटने का।

आतिशबाजी और दीपावली एक दूसरे के पर्याय माने जाते हैं। हर साल करोड़ों की आतिशबाजी से प्रदूषण तो फैलता ही है, हमारी जेब भी हल्की करता है। वह भी महज चंद पल के लिए। फायदा होता है उत्पादक और विक्रेताओं को। उत्पादन लागत, परिवहन आदि के चलते हर साल पटाखे महंगे भी होते जा रहे हैं। अपने शहर की बात करें करीब 25 करोड़ की आतिशबाजी बिक जाती है। सुप्रीम कोर्ट ने रात आठ से दस बजे तक ही आतिशबाजी चलाने के लिए समय निर्धारित किया है। आदेश का पालन होने पर न केवल पटाखे कम फोड़े जाएंगे, बल्कि शोर और प्रदूषण भी कम होगा।

कीमतों ने गरीबों के हाथ से छीनी फुलझड़ी

महंगाई इस कदर बढ़ी है कि पटाखे गरीब बच्चों के हाथ से दूर हो गए। दुकानदारों का कहना है कि कीमत उनके हाथ में नहीं है। चेन्नई से आतिशबाजी दिल्ली आती है। वहां से शहर तक आने का खर्च हर साल बढ़ता है, जिससे कीमत भी बढ़ती है। गरीबों के साथ मनाएं दीपावली

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शहीद रामाश्रय वेलफेयर सोसाइटी की अध्यक्ष दिव्यांशी यादव का कहना है कि जो लोग लाखों रुपये पटाखों में खर्च कर देते हैं। वह गरीब बच्चों को कपड़े, मिठाई व अच्छा खाना देकर उनके साथ खुशियां बांट सकते हैं। भिक्षा मांगते तमाम बच्चे दिखते हैं। ऐसे बच्चों की मदद की जा सकती है। हम भी ऐसे बच्चों के पर्व मनाएंगे। समाज को दे सकते हैं बेहतर संदेश: अभिनंदन सिंह

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एसपी सिटी अभिनंदन सिंह ने कहा कि यह काफी अच्छा विचार है। जो रुपये हम पटाखों के लिए रखते हैं, उसका कुछ हिस्सा गरीबों पर खर्च करें तो बेहतर होगा। इस तरह से हम अपने बच्चों और समाज को अच्छा संदेश दे सकते हैं।

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