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टोल प्लाजा विवाद: सुप्रीम कोर्ट ने बाराबंकी केस दिल्ली ट्रांसफर किया, कर्मियों को मुचलके पर रिहाई

Published: Thu, 19 Mar 2026 02:56 PM (IST)

सुप्रीम कोर्ट ने बाराबंकी के हैदरगढ़ टोल प्लाजा विवाद मामले में अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने आरोपित टोल कर्मियों ...और पढ़ें

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HighLights

  1. सुप्रीम कोर्ट ने टोल कर्मियों को मुचलके पर रिहा करने का आदेश दिया।

  2. बाराबंकी का मुकदमा दिल्ली की तीस हजारी कोर्ट में स्थानांतरित किया गया।

  3. बार एसोसिएशन की भूमिका पर सुप्रीम कोर्ट ने जताई कड़ी नाराजगी।

जागरण संवाददाता, बाराबंकी। लखनऊ-सुलतानपुर हाईवे स्थित हैदरगढ़ के गोतौना टोल प्लाजा पर अधिवक्ता और टोल कर्मियों के बीच हुए विवाद मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसला सुनाते हुए आरोपित टोल कर्मचारियों को राहत दी है। कोर्ट ने जेल में बंद कर्मियों को मुचलके पर रिहा करने और मुकदमे को दिल्ली ट्रांसफर करने का आदेश दिया है।

सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की डबल बेंच ने मामले की सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया। अदालत ने जेल में बंद टोल कर्मियों को मुचलके पर रिहा करने का निर्देश दिया, साथ ही उत्तर प्रदेश पुलिस के डीजीपी को आदेश दिया है कि रिहाई के समय सभी आरोपितों को सुरक्षा और स्कार्ट उपलब्ध कराई जाए।

अदालत ने मामले की निष्पक्ष सुनवाई सुनिश्चित करने के लिए इसे बाराबंकी की अदालत से हटाकर तीस हजारी कोर्ट, दिल्ली स्थानांतरित करने का भी निर्देश दिया है। इसके साथ ही कोर्ट ने बार एसोसिएशन की भूमिका पर नाराजगी जताते हुए बार काउंसिल आफ इंडिया और उत्तर प्रदेश बार काउंसिल को पत्र भेजने का आदेश दिया।

मामला 14 जनवरी 2026 का है, जब रत्नेश शुक्ला लखनऊ से प्रतापगढ़ जा रहे थे। हैदरगढ़ के गोतौना टोल प्लाजा पर टोल शुल्क को लेकर उनका टोल कर्मियों से विवाद हो गया था। घटना का वीडियो प्रसारित होने के बाद कई जिलों के अधिवक्ताओं ने टोल प्लाजा पर प्रदर्शन किया और आरोपित कर्मचारियों की गिरफ्तारी की मांग उठी।

पुलिस ने टोल कर्मियों लवलेश, रवि तोमर, गोलू और विश्वजीत समेत 10 अज्ञात के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर नामजद आरोपितों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था। अधिवक्ताओं के दबाव के चलते बाराबंकी में कोई भी वकील आरोपितों की पैरवी के लिए तैयार नहीं हुआ।

बाद में पांच फरवरी 2026 को अधिवक्ता मनोज कुमार शुक्ला ने आरोपितों की ओर से जमानत अर्जी दाखिल की, लेकिन इसकी जानकारी होते ही सिविल कोर्ट परिसर में कुछ अधिवक्ताओं ने उनकी सीट पर हमला कर कुर्सी, मेज और अन्य सामान जला दिया। इस घटना के बाद मनोज शुक्ला ने मामले की पैरवी से खुद को अलग कर लिया था।