बाराबंकी : लॉकडाउन में लौटे प्रवासियों की गृहस्थी की गाड़ी जन सहयोग से पटरी पर आ रही है। यह कहना इसलिए गलत न होगा क्योंकि बाहर से आए परिवारों के सामने सबसे ज्यादा समस्या आवास की है। वर्षों पहले गांव छोड़कर गए और होली-दीवाली आए भी तो गांव के पुराने घर को ठीक कराने की जरूरत न समझना भारी पड़ा। ऐसे समय में ग्रामीणों के साथ ही रिश्तेदारों व सेवाभावी लोगों की मदद से लोग रहने के लिए आशियाना बना रहे हैं।

हैदरगढ़ तहसील क्षेत्र के ग्राम रानीखेर मजरे लाही निवासी भोला लोध अपने चार पुत्रों के परिवार संग लखनऊ में कई साल से रहा था। वह राजगीर मिस्त्री व उसके पुत्र जयकरन, राम करन, शिव करन व उमेश भवन निर्माण में मजदूरी करते थे। गांव का घर खंडहर हो गया। लॉकडाउन में लौटने के बाद खाली पड़ी जमीन में चार छप्पर जनसहयोग से रखे हैं। छप्परों के नीचे शुक्रवार को भोला के बड़े पुत्र जयकरन के विवाह के लिए वरीक्षा की रस्म भी पूरी की गई। भोला ने बताया कि छप्पर के लिए उसे पुआल व सरपत गांव के सर्वजीत रावत, हरिश्चंद्र, राम अवध व हनुमान ने दिया। छप्पर छाने में गांव के राम किशुन व धनीराम ने विशेष सहयोग किया। बांस की व्यवस्था बाजपुरवा गांव के बरसाती व नहरिया गांव के राम कुमार, नाथगंज के सजन ने कराई।

हैदरगढ़ तहसील क्षेत्र के ही ग्राम पठानपुरवा मरजे मरुई में मुंबई से पत्नी व बच्चों के संग छह मई को लौटे तौकीर खां ने बताया कि गांव के पुश्तैनी घर में रहने की जगह नहीं थी। भाई की दीवार पर रखने के लिए गांव के हसीब ने टिन की चादरें दे दीं। बांस-बल्ली भी गांव में ही मिल गए। इस तरह जनसहयोग से रहने का ठिकाना टिनशेड के नीचे हो गया।

Posted By: Jagran

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