विक्रमादित्य सिंह/ रिशु गुप्ता (बाराबंकी)

लॉकडाउन के दौरान गांवों में खूबसूरत फूल जहां धूल खा रहे हैं वहीं हरी सब्जियां व फल भले ही आमदनी का जरिया न बन पाए हो पर लोगों की भूख जरूर मिटा रहे हैं। कुछ सेवाभावी लोग इस मुसीबत की घड़ी में फलों व सब्जियों को जरूरतमंदों में नि:शुल्क बांट रहे हैं तो वहीं फूल खेतों में निष्प्रयोज्य धूल खा रहे हैं क्योंकि मंदिर-मस्जिद बंद हैं। वैवाहिक समारोह के मंडप भी फूलों से नहीं सजाए जा रहे।

बनीकोडर ब्लॉक के ग्राम पूरेमंशाराम दिवान मजरे गजपतिपुर निवासी सगे भाई अब्दुल कय्यूम व अब्दुल नयूम का नि:शुल्क सब्जी वितरण कार्य सराहा जा रहा है। इन दोनों भाइयों ने मतस्य पालन के लिए छह बीघे खेत में मनरेगा से तालाब खोदवाया था। तालाब के चारों तरफ चौड़े तटबंध बनाए। उन्हीं तटबंधों पर लौकी, तरोई, करेला, तरबूज की फसल तैयार की। लॉकडाउन के दौरान खूब लौकी, तरोई व तरबूज पैदा हुआ है। आसपास के गांवों में खासकर बाहर से लौटे प्रवासी जिनके पास आर्थिक संकट है और गांव के जरूरतमंद परिवार जो बेरोजगारी में परेशान हैं उन्हें दोनों भाई सब्जियां व तरबूज निश्शुल्क वितरित कर रहे हैं।

हर रोज इनके तालाब पर सब्जियां लेने के लिए भी लोग आते हैं। लेकिन, इनकी कोशिश होती है कि लोगों के घरों तक सब्जियां पहुंचा दें ताकि घर से बाहर निकलने पर लॉकडाउन के नियम का अनुपालन होता रहे। दोनों भाइयों का कहना है कि कोरोना वायरस से जंग में तमाम लोग पीएम व सीएम केयर फंड में धनराशि दे रहे हैं। मास्क, गमछा व भोजन बांट रहे हैं। वहीं लालपुर राजपुर निवासी फैयाज हुसैन के एक हेक्टेयर खेत में ग्लैडियोलस के फूल लगे हुए हैं। उन्होंने बताया कि लखनऊ, दिल्ली व फैजाबाद की मंडियों में फूल की कोई मांग नहीं है। गांव में भी इन फूलों का कोई उपयोग नहीं हैं।

Posted By: Jagran

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