सौरभ तिवारी, बांदा : जीवन में अंधेरा था। रास्ता कठिन था। अति पिछड़े गांव से होने के कारण ज्यादा संसाधन भी नहीं थे। पास में कुछ था तो जज्बा। इसी के सहारे बस कदम बढ़े तो सफलता दर सफलता पाते हुए मुकाम साफ नजर आने लगा। कहानी बुंदेलखंड के उस लाल की है जिसकी आंखों में रोशनी नहीं है, लेकिन कड़ी मेहनत और लगन के बूते जिंदगी में उम्मीदों का सवेरा आया। जिले से लेकर राष्ट्रीय स्तर पर खेलों में उसका अनंत यश देख आप भी कह उठेंगे-शाबाश यशवंत। इस युवक ने छोटे से गांव से देश की राजधानी तक का सफर किया। देश के कोने-कोने से अपने खेल से हर किसी को दांतों तले उंगलियां दबाने पर मजबूर कर दिया। 40 से अधिक पदक जीत चुके हैं यशवंत। प्रशासन ने उनका नाम राज्य पुरस्कार के लिए भेजा है।

बिसंडा ब्लाक क्षेत्र के घूरी गांव के रहने वाले जगदेव प्रसाद के पुत्र यशवंत ने ढाई साल की उम्र में अपनी आंख खो दी थी। एक बीमारी ने कमजोर आंखों से पूरी रोशनी ही छीन ली जो आज तक नहीं ठीक हो सकी। यशवंत अपने पांच भाइयों में सबसे बड़े हैं। बिसंडा ब्लाक में एक दृष्टि बाधित विद्यालय में कक्षा पांचवी तक की पढ़ाई की। इसके बाद महोखर स्थिति राजकीय दृष्टि बाधित इंटर कालेज में आ गए। यहीं से यशवंत ने अपने आंखों को कमजोरी नहीं बनने दिया। पहले उन्होंने विद्यालय के खेलों में हिस्सा लिया। प्रशिक्षकों ने उनकी प्रतिभा को आंक कर जनपद और मंडल स्तर तक प्रतिभाग कराया। यशवंत ने सफलता दर सफलता चूमी। देश के कई बड़े महानगरों में यशवंत ने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया है। उनको एथलेटिक्स, दौड़, शतरंज, तैराकी और क्रिकेट जैसे खेलों में महारथ हासिल है। यशवंत इस समय दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र हैं।

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इनसेट.

कुछ प्रमुख पुरस्कार

0 जमशेदपुर में नेशनल दौड़ में गोल्ड मेडल।

0 लखनऊ में नेशनल जूडो में सिल्वर मेडल।

0 हरियाणा में नेशनल जूडो में सिल्वर मेडल।

0 उदयपुर में नेशनल तैराकी में गोल्ड मेडल।

0 दिल्ली में नेशनल डिबेट में गोल्ड मेडल।

Edited By: Jagran