संवाद सहयोगी अतर्रा : हर जगह नाला व नालियों का एक जाल फैला है। हालांकि बहुत से छोटे व बड़े नाले कब्जा की चपेट में हैं। परंपरागत तरीके से निकले इन नालों का जल संरक्षण में शुरू से अहम योगदान रहा है। नाला-नालियों का पानी गांव में बने तालाबों में पहुंच संरक्षित होता आया है।

तहसील क्षेत्र के ज्यादातर गांवो में जलनिकासी की समस्या को देखते हुए जनप्रतिनिधियों ने सड़को के साथ ही नाला-नालियों का भी जाल बिछाया था। इन छोटे बड़े नाला नालियों के निर्माण से ग्रामीणों को दोहरा लाभ होता रहा है। जहां एक ओर गंदा पानी सड़को में नही बहता है।वही दूसरी ओर इन नाला नालियों का पानी गांव में बने तालाबों में पहुंच एकत्रित होता रहा है। जिससे गांव का उपयोगहीन पानी भी संरक्षित होकर जल स्तर बढ़ाने में कारगर साबित होता था।साथ ही पुराने जमाने मे गांवो में ग्रामीण अपने अपने घरों के बाहर गंदे पानी के लिए बाहर एक छोटा गढ्ढा बनाते थे। जिसमें प्रतिदिन सफाई करते हुए गंदगी बाहर फेंक दिया जाता था और पानी उस गढ्ढे में सोख जाता था, लेकिन आधुनिक समय में ग्रामीण क्षेत्र में भी यह गढ्ढे समाप्त होने की कगार पर हैं। और बने नाला नालियां भी तमाम जगह कब्जों के अवरोध में हैं। जिसके चलते उनका पानी तालाबों तक नही पहुंच पा रहा है। यदि भी सभी लोग सतर्क हो नाला-नालियों का पानी तालाबों (गड्ढानुमा) में पहुंचाएं और गढ्ढे़ बना घर के उपयोग का पानी एकत्र करने लगे, तो पानी की एक-एक बूंद को सहेज सकते हैं। -पानी की एक-एक बूंद सहेजने की जिम्मेदारी हम सभी की है। यदि ग्रामीण क्षेत्र में सभी लोग अपने घरों में गढ्ढे तैयार कर लेंगे। तो उससे बारिश के पानी के साथ ही घरों में उपयोग होने वाला पानी संरक्षित होगा। -उमाशंकर पांडेय, जलयोद्धा

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