कालिंजर, संवाद सूत्र : अजेय तीर्थ दुर्ग कालिंजर में कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर लगने वाला पांच दिवसीय कतकी मेला अपने अंदर एक हजार वर्षो का इतिहास समेटे हुए है। चंदेल शासक परिमर्दिदेव 1165-1202 के समय प्रारंभ हुआ। यह मेला आज पूरी तरह से प्रशासनिक उपेक्षा का शिकार है।

कालिंजर पुरातन काल से ही धार्मिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र था। पौराणिक काल से ही यहां मेलों एवं तीर्थाटन की परंपरा थी। सर्वप्रथम राजा परिमर्दिदेव के मंत्री नाटककार वत्सराज द्वारा रचित नाटक रूपक षटकम में कालिंजर महोत्सव का उल्लेख मिलता है। उनके शासनकाल में प्रतिवर्ष वत्सराज दो नाटकों का मंचन कालिंजर महोत्सव के अवसर पर किया जाता था। मदनवर्मन के समय पद्मावती नामक नर्तकी की जानकारी कालिंजर के इतिहास में मिलती है। उसका नृत्य उस समय कालिंजर महोत्सव का प्रमुख आकर्षक था। एक हजार साल पुरानी यह परंपरा आज भी कतकी मेले के रूप में विद्यमान है। जिसमें विभिन्न अंचलों के लाखों लोग कालिंजर आकर विभिन्न सरोवरों में स्नान कर भगवान नीलकंठेश्वर के दर्शन कर पुण्य लाभ अर्जित करते हैं। कालिंजर महोत्सव की प्राचीन परंपरा को जीवित बनाए रखने के लिए सर्वप्रथम 1988 में तत्कालीन जिलाधिकारी हरगोविंद विश्नोई के प्रयासों से खंड परंपरा चालू हुई। सन 1990 में जिलाधिकारी राकेश गर्ग महोत्सव का आयोजन करवाया। वर्ष 1992 में जिलाधिकारी डा. शंकरदत्त ओझा के विशेष प्रयासों से विश्व धरोहर सप्ताह का आयोजन हुआ। जिसमें देश के ख्यातिप्राप्त कलाकारों ने सात दिनों तक अपने कार्यक्रम प्रस्तुत किए। वर्ष 2000 में जिलाधिकारी डीएन लाल एवं मुख्य विकास अधिकारी कोमल राम के संयुक्त प्रयासों से आठ वर्ष बाद कालिंजर महोत्सव मनाया गया। वर्ष 2001 में जनप्रिय जिलाधिकारी नीतीश्वर कुमार ने कालिंजर महोत्सव का आयोजन करवाया। इसमें रवींद्र जैन की संगीत संध्या और भोजपुरी फिल्म स्टार मनोज तिवारी कार्यक्रम अद्वितीय था लेकिन इसके बाद जिला प्रशासन की अनदेखी से यह परंपरा आगे नहीं बढ़ सकी। इस वर्ष यह मेला 5 नवंबर से प्रारंभ होकर 8 नवंबर तक चलेगा। परंतु अभी तक कालिंजर मेला क्षेत्र में पेयजल, सफाई, रात्रि में प्रकाश की कोई व्यवस्था नजर नहीं आ रही। कालिंजर गांव से होकर मेला पहुंचने वाले मार्ग की नालियां बजबजा रही हैं। उन्हें साफ करवाने की कोई आवश्यकता ही नहीं समझी गई। ज्ञातव्य हो कि दो दिन पूर्व दशमी रविवार पर भगवान के दर्शनों को आए भक्तजन प्यास के मारे पूरे किला में भटकते रहे। उन्हें पीने का पानी तक मयस्सर नहीं हो सका। किला पहुंचने के लिए सड़क मार्ग जर्जर है। कालिंजर वासियों ने जिलाधिकारी का ध्यान आकृष्ट करवाते हुए मेले में पेयजल, प्रकाश, सुरक्षा की समुचित व्यवस्था कराए जाने की मांग की है।

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