बलरामपुर : जिले में रोडवेज बसों से सुहाने सफर का सपना साकार नहीं हो पा रहा है। लंबी दूरी तय करने वाली खस्ताहाल बसें अक्सर बीच रास्ते में खड़ी हो जाती हैं। जिससे यात्रियों को हलकान होना पड़ता है। वहीं चालक, परिचालकों के अभाव में करीब 15 बसें डिपो में शोपीस बनकर खड़ी रहती हैं। जिससे यात्रियों को गंतव्य तक पहुंचने के लिए बाहर से बसें आने का इंतजार करना पड़ता है। जिम्मेदार कर्मचारियों के कमी की दुहाई देकर अपना पल्ला झाड़ लेते हैं।

रोडवेज के बेड़े में कुल 80 बसें हैं। जिनमें 65 बसों के सहारे उतरौला, तुलसीपुर, बहराइच व गोंडा मार्ग पर परिवहन निगम की सेवाएं संचालित हो रहीं हैं। यहां की बसें नेपाल सीमा से सटे बढ़नी सहित लखनऊ, कानपुर व दिल्ली तक का सफर तय करती हैं। सड़कें खराब होने के कारण बसें भी जर्जर हो जाती हैं। सड़क के गड्ढों में फंसने से बसों के टायर समय से पहले ही जवाब दे जाते हैं। नियमत: 60 हजार किलोमीटर पर नया टायर लगाना रहता है, लेकिन जिले में 35 हजार पर ही टायरों की रब¨ड़ग करनी पड़ती है। साथ ही वाहनों की माइलेज भी प्रभावित होती है। जिससे राजस्व की भी क्षति होती है। वर्कशॉप में बनी पानी टंकी जर्जर है, जो कभी भी दुर्घटना का कारण बन सकती है।

कर्मचारियों की कमी बनी रोड़ा

बलरामपुर डिपो में 80 बसों के सापेक्ष 48 नियमित चालक हैं। बसों के संचालन के लिए 108 संविदा चालक हैं। परिचालन की जिम्मेदारी 93 संविदा परिचालकों पर है। वहीं तकनीकी कर्मचारियों की भी कमी है। 30 के सापेक्ष मात्र नौ तकनीकी कर्मियों की तैनाती है। जिससे बसों की मरम्मत समय से नहीं हो पाती है।

जिम्मेदार के बोल

-सहायक क्षेत्रीय प्रबंधक परशुराम पांडेय का कहना है कि 62 परिचालकों व 16 चालकों की आवश्यकता है। तकनीकी कर्मियों की कमी के बारे में भी उच्चाधिकारियों को अवगत कराया गया है। सीमित संसाधनों में यात्रियों को बेहतर सुविधाएं देने का प्रयास किया जाता है। जर्जर सड़कों के कारण बसों में अधिक मरम्मत का कार्य निकलता है।

Posted By: Jagran