बलरामपुर : पहली मुहर्रम बुधवार को है। जिले में दस हजार से अधिक छोटे-बड़े ताजिए रखे जाएंगे। पहले दिन ही मुहर्रम से गम ए हुसैन की सदाएं गूंजने लगेगी। मुहर्रम को लेकर पुलिस व प्रशासन सतर्क हो गया है। उतरौला संवादसूत्र के अनुसार मुहर्रम की तैयारियां पूरी हो चुकी है। यह इस्लामिक कैलेंडर का पहला महीना है। इसी महीने से इस्लाम का नया साल शुरू होता है। इस महीने की दस तारीख को रोज-ए-आसुरा होता है। मोहर्रम के महीने में इस्लाम धर्म के संस्थापक हजरत मुहम्मद साहब के छोटे नवासे इमाम हुसैन और उनके 72 अनुयाइयों का तब कत्ल कर दिया गया था, जब वे इराक के शहर करबला में यजीद की फौज से मानवता की रक्षा के लिए लड़ रहे थे। क्षेत्र में मुहर्रम के दौरान जगह-जगह मातमी मजलिसों का एहतमाम किया जाता है। हजरत इमाम हुसैन की शान में तकरीर कर लोगों को आगाह किया जाता है कि वे अपने भीतर मुसलमान और हजरत इमाम हुसैन के गुण पैदा करें। मुहर्रम की पहली तारीख से दसवीं मुहर्रम तक जुलूस निकाले जाते हैं। नगर क्षेत्र में शिया समुदाय के लोग पूरे महीने तक काले लिबास में रहकर हजरत इमाम हुसैन को खिराजे अकीदत पेश करते हैं। यहां का मातम क्षेत्र भर में प्रसिद्ध है। नवीं मुहर्रम की रात राजमहल के परिसर में युवक और बच्चे नंगे पांव जलते हुए अंगारों पर चलते हैं। नवीं मुहर्रम को ही शिया और सुन्नी समुदाय के लोग ताजिया रखकर रात भर मार्सिया (शोकगीत) गाते हैं। ग्रामीण क्षेत्र गैंड़ास, रानीपुर, इमिलिया, महदेइया, चमरूपुर, महुआ बाजार आदि में रखी जाने वाली आकर्षक ताजियों देखने और जियारत करने वालों की भारी भीड़ जुटती है। मन्नत रखने वाले पायक मोरपंख, घुंघरू आदि पहन कर नंगे पांव जगह-जगह रखे ताजियों की जियारत करने पहुंचते हैं। शिया समुदाय के लोग जो ईरान, ईराक, आस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, पाकिस्तान आदि देशों में रहकर आजीविका कमाते हैं वे भी मुहर्रम के महीने में मुल्क वापसी कर चेहल्लुम तक रहकर मातम मनाते हैं। उतरौला क्षेत्र का मुहर्रम देश भर में अपनी विशिष्ट पहचान रखता है।

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