ददरी मेला का नाम तो सुना ही होगा? सनातन परंपरा की है पहचान लेकिन अभी उस जगह जंगल का राज
बलिया का ऐतिहासिक ददरी मेला, जो सनातन परंपरा और धार्मिक आस्था का प्रतीक है, वर्तमान में उपेक्षा और झाड़-झंखाड़ का ...और पढ़ें
HighLights
ददरी मेला सनातन परंपरा और बलिया की ऐतिहासिक पहचान है।
मेला स्थल पर झाड़-झंखाड़ और अव्यवस्था से लोग परेशान हैं।
गंगा-सरयू संगम और भारतेंदु के उन्नति संदेश का साक्षी।
जागरण संवाददाता, बलिया। बलिया के ददरी मेले का धार्मिक ग्रंथों में बड़ा नाम है। यह सनातन परंपरा की पहचान है। कार्तिक पूर्णिमा के दिन से महर्षि भृगु की भूमि पर लोकजीवी फलक का विस्तार होता है। मेले की रौनक में लोकसंस्कृति के रंग बिखरते हैं और सनातन परंपरा की जड़ें अपनी जीवंतता का अहसास कराती हैं, लेकिन अभी के समय में उसी ऐतिहासिक स्थल पर झाड़-झंखाड़ और जंगल का विस्तार दिखाई दे रहा है।
ददरी मेला केवल खरीदारी और मनोरंजन का आयोजन नहीं, बल्कि बलिया की ऐतिहासिक पहचान, धार्मिक आस्था और लोकजीवन का महत्वपूर्ण फलक है। इस मेले से जुड़ी परंपराएं पीढ़ियों से लोगों को जोड़ती रही हैं। ऐसे में मेला स्थल पर उगी झाड़ियां और फैली अव्यवस्था लोगों को अपनी सांस्कृतिक धरोहर की उपेक्षा का अहसास कराती हैं।

शहर के दक्षिण छोर पर 89 एकड़ भूमि पर इसे मेले का विस्तार होता है। इसके लिए लगभग 800 से ज्यादा किसानों की भूमि का अधिग्रहण किया जाता है। नगर पालिका परिषद की तरफ से किसानों को उनकी भूमि के बदले उचित मुआवजा भी दिया जाता है।
अभी मेला शुरू होने में लगभग एक माह का समय है, लेकिन पहले से साफ-सफाई की व्यवस्था नहीं होने के चलते हर साल दुकानदार परेशान होते हैं। मेले में लगभग 600 दुकानें लगतीं हैं। ये दुकानदार अलग-अलग स्थानों से पूरे एक माह के लिए अपनी दुकान लगाते हैं। मेले की जमीन समतल नहीं होने से लोगों को भी दिक्कताें का सामना करना पड़ता है।
गंगा व सरयू के मिलने का भी साक्षी भी ददरी मेला
गंगा की जलधारा को अविरल बनाए रखने के ऋषि मुनियों के प्रयास का जीवंत प्रमाण ददरी मेला हर कालखंड की परंपरा को अपने अंदर समेटे हर साल एक नया संदेश देता है। यह मेला बलिया में गंगा और सरयू के मिलन का भी साक्षी है। पूर्वांचल के लोग कार्तिक पूर्णिमा पर भृगु धरती की गंगा में स्नान कर धन्य होंगे। काशी और प्रयागराज के बाद यूपी का यह तीसरा सबसे बड़ा धार्मिक महत्व वाला स्थान है।
भृगु क्षेत्र महात्म्य पुस्तक में ऐसा उल्लेख मिलता है कि महर्षि भृगु ने सरयू नदी की जलधारा को अयोध्या से अपने शिष्य दर्दर मुनि के द्वारा बलिया में संगम कराया था। उस काल खंड में यह बहुत बड़ा काम था। अपने शिष्य के इस कार्य से हर्षित भृगु ने एक विशाल उत्सव, यज्ञ करवाया जिसमें एशिया महाद्वीप के लोगों ने भाग लिया। उसी समय से महर्षि भृगु के शिष्य दर्दर मुनि के के नाम पर यह मेला लगता है।

ददरी मेले से निकला था ‘भारतवर्षोन्नति’ का मंत्र
जिस ददरी मेले की धरती से भारतेंदु हरिश्चंद्र ने वर्ष 1884 में देशवासियों को उन्नति का संदेश दिया था, आज वही ऐतिहासिक विरासत अपनी पहचान और सम्मान के लिए संघर्ष कर रही है। कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर ददरी मेले में पहुंचे भारतेंदु हरिश्चंद्र ने बलिया में जुटे जनसमूह को संबोधित करते हुए देश की उन्नति के लिए सामूहिक प्रयासों की जरूरत बताई थी।
उनका संदेश था कि भारतीय समाज को दिशा देने वाला नेतृत्व मिले तो वह बड़ी उपलब्धियां हासिल कर सकता है। उनकी यह विचारधारा आज भी प्रासंगिक है, लेकिन मेले को अब तक अपेक्षित राजकीय पहचान नहीं मिल सकी है। साहित्यकार शिवकुमार सिंह कौशिकेय के अनुसार, पहले मेले में घरेलू उद्योगों और हस्तशिल्प के सामानों की बिक्री होती थी। गांवों के लोग सामूहिक रूप से यहां आते और मेल-मिलाप के साथ परंपराओं का निर्वहन करते थे। आधुनिकता के बीच मेले का पुराना स्वरूप कमजोर पड़ा है।
