लवकुश सिंह

बलिया : दीपावली आपसी सोहार्द का त्योहार है। यह हमारी आपसी एकता का प्रतीक भी है। दीपावली मनाने की सार्थकता तभी है जब भीतर का अंधकार दूर हो। यह तभी संभव है जब हम अपनी पुरानी परंपराओं की ओर लौटेंगे। इस दीपावली गरीब भी अपने घर को रोशन कर सकें, इसलिए मिट्टी के दीयों की खरीदारी कर उसमें आपसी स्नेह की बाती डालें, ताकि हमारी विलुप्त होती पुरानी परंपरा इस दिवाली जिदा हो सके। देश के सभी महपुरुषों की मंशा भी यही रही है। देवी-देवता तक को मिट्टी के दीये ही स्वीकार होते हैं।

मिट्टी के दीयों की खरीदारी से दो फायदे होंगे। पहला यह कि आपके घर में देवी लक्ष्मी का स्वागत भी देशी शुद्ध मिट्टी के दीयों से हो जाता है, वहीं दूसरा फायदा यह कि मिट्टी के दीयों को बेचने वालों को भी अच्छी आमदनी हो जाती है। कई माह पहले से आग में तप कर कुम्मार इन दीयों को तैयार करते हैं। दीपावली में उनके दीयों की बिक्री होने पर उनकी भी अच्छी आमदनी हो जाती है। इससे वे भी अपनी दीपावली खुशी-खुशी मना लेते हैं।

मिट्टी के दीयों से जुड़े कई माíमक पोस्ट सोशल मीडिया पर भी चल रहे हैं। उनकी सराहना भी हो रही है। मिट्टी के दीयों को बढ़ावा देने के लिए नगर की सामाजिक संस्था पूरबिया के सदस्यों ने जिलाधिकारी को एक आवेदन देकर मांग भी किया है कि ग्रामीण अंचलों में मिट्टी के दीयों को बनाकर जो कुम्हार बिक्री के लिए नगर में आते हैं, उन्हें हर तरह से प्रोत्साहित किया जाए। संस्था के अश्वनी कुमार सिंह ने बताया कि दीपावली से पूर्व नगर में मिट्टी के दीयों की स्टाल लगवाने के लिए संस्था की ओर से विशेष तैयारी की गई है। उनकी दुकानों के पास ही सेल्फी जोन भी बनाया जाएगा7 हलांकि आज सभी लोगों का झुकाव इलेक्ट्रानिक झालरों व लाइटों की ओर ज्यादा हैं। दीपावली से पहले ही बहुत से लोग अपने घरों को इलेक्ट्रानिक चाइनीज झालरों से पाट देते हैं। इससे उनका घर तो सुंदर दिखता है लेकिन जो खुशी मिट्टी के दीयों को जलाकर घर रोशन करने से मिलती है, वह खुशी इलेक्ट्रानिक झालर नहीं दे पाते। पूर्व के समय में इसी मिट्टी के दीयों से घर को रोशन करने की हमारी परंपरा रही है। आधुनिकता के बीच भी बलिया में मिट्टी के दीयों की उपयोगिता कम नहीं हुई है। तभी तो नगर में जगह-जगह मिट्टी के दीयों की दुकानें सजने लगी हैं। -अब डिजाइन किए मिट्टी के दीये बाजारों में उपलब्ध

अब के लोगों की मानसिकता को देखते हुए कुम्हार वर्ग डिजाइन किए हुए दीये बनाने लगे हैं। नगर में मिट्टी के दीये तीन रेट में बिक रहे हैं। साधारण दीये 40 से 60 रुपये सैकड़ा के हिसाब से बिक रहे हैं, वहीं डिजाइन किए हुए दिए चार सौ रुपये से पांच सौ रुपये सैकड़ा के हिसाब से मिल रहे हैं। इनसेट-

सोने-चांदी के सिक्कों की भी खूब हो रही खरीदारी

दीपावली में हैसियत के मुताबिक लोग सोने-चांदी के सिक्कों की खरीदारी भी खूब कर रहे हैं। स्वर्ण आभूषण के लिए लोग धनतेरस का इंतजार कर रहे हैं लेकिन पूजा के लिए या रिश्तेदारों को उपहार देने के लिए लोग सिक्कों की खरीदारी करने लगे हैं। इसके पीछे लोगों का मत है कि ये सिक्के घर की थाती के रुप में सैदव स्थापित रहते हैं। घर खर्च में बचत कर हर साल सिक्कों की खरीदारी कर लोग उसे दीपावली के दिन भगवान लक्ष्मी गणेश की मूíत के समक्ष सर्मिपत करते हैं। वहीं कुछ लोग अपने रिश्तेदारों को भी इसे उपहार के रुप में देते हैं। इनसेट-

-शुभ ऊर्जा को आमंत्रण है, रंगोली संग दीपक का जलाना

जिले के जयप्रकाशनगर दलजीत टोला के आचार्य पंडित गोरखनाथ चतुर्वेदी ने दीपावली में घर के अंदर शुभ ऊर्जा के आमंत्रण के संबंध में बताया कि दीपावली कामनापूíत के लिए घर भी महत्वपूर्ण हो जाता है। यही कारण है कि दीपावली से जुड़ी बहुत सारी तैयारियां, रीति-रिवाज के अनुसार ही हम करते हैं। दीप पर्व के दौरान मुख्य द्वार पर तोरण, रंगोली, साज-सज्जा के साथ ही दीपक जलाना शुभ ऊर्जाओं को आमंत्रण और उनके स्वागत के लिए विशेष होता है। यह भी ध्यान रखें कि मुख्य द्वार में कहीं छिद्र और दरार न हो तथा उसे खोलने और बंद करने में आवाज न आती हो। शुभ लक्षणों से युक्त द्वार लक्ष्मी को आमंत्रित करने में सहायक होता है। दीपावली के लिए भवन की साफ-सफाई और लिपाई-पुताई की परंपरा है। घर में दरारें, टूट-फूट, सीलन के निशान और बदरंगी दीवारें शुभ ऊर्जा को ग्रहण करने में असमर्थ होती हैं। पर्व के दौरान घर का वातावरण धूप-अगरबत्ती से सुगंधित करना चाहिए। दीपावली में विशेष कर कबाड़ से मुक्ति पाने का सीधा संबंध आíथक प्रगति से है। वास्तु के अनुसार ईशान यानी उत्तर-पूर्व दिशा का पूजन कक्ष सर्वोत्तम होता है। लक्ष्मी-गणेश को द्रब्य के रुप में सोने-चांदी के सिक्के भी चढ़ाने की परंपरा है।

Posted By: Jagran

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