बलिया छात्रसंघ से विधानसभा तक: जब इंदिरा गांधी को बलिया बुलाने के लिए चंद्रशेखर के पीछे मुंबई पहुंच गए थे राम गोविंद चौधरी
यह लेख राम गोविंद चौधरी के छात्र जीवन से लेकर विधानसभा तक के राजनीतिक सफर को दर्शाता है। इसमें इंदिरा ...और पढ़ें

HighLights
इंदिरा गांधी को बलिया छात्रसंघ उद्घाटन के लिए मुंबई तक पीछा किया।
जेपी आंदोलन से जुड़े, आपातकाल में 19 महीने जेल में बिताए।
बांसडीह में बच्चा पाठक के लंबे राजनीतिक प्रभाव को चुनौती दी।
जागरण संवाददाता, बलिया। राम गोविंद चौधरी के छात्र जीवन का एक दिलचस्प प्रसंग तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से जुड़ा है। 1971-72 के दौरान उनके मित्र गौरी शंकर सिंह छात्रसंघ अध्यक्ष चुने गए थे। दोनों की इच्छा थी कि छात्रसंघ का उद्घाटन इंदिरा गांधी से कराया जाए।
इसके लिए दोनों दिल्ली में समाजवादी नेता चंद्रशेखर के पास पहुंचे और उनसे इंदिरा गांधी को आमंत्रित कराने का अनुरोध किया। चंद्रशेखर ने तत्काल हामी नहीं भरी। जब उन्हें पता चला कि चंद्रशेखर किसी कार्यक्रम के सिलसिले में मुंबई जा रहे हैं, तो राम गोविंद चौधरी और उनके साथी भी मुंबई पहुंच गए।
वहां भी उन्होंने अपना आग्रह दोहराया। बाद में चंद्रशेखर दिल्ली लौटे तो दोनों फिर उनके पास पहुंच गए। अंततः चंद्रशेखर ने इंदिरा गांधी से फोन पर बात की और बलिया के छात्रों की ओर से उन्हें आमंत्रित किया। राम गोविंद चौधरी ने स्वयं एक साक्षात्कार में इसको बताया था।
छात्र नेता से सीधे जेल तक का सफर भी रहा, जेपी आंदोलन से भी जुड़े
राम गोविंद चौधरी की राजनीति की शुरुआत छात्र जीवन में हुई। बलिया के मुरली मनोहर टाउन महाविद्यालय में पढ़ाई के दौरान वे छात्र राजनीति में सक्रिय हुए और छात्रसंघ के महामंत्री तथा बाद में अध्यक्ष बने। इसके बाद वे जयप्रकाश नारायण के आंदोलन से जुड़े।
1975 में आपातकाल के दौरान उनकी गिरफ्तारी हुई और उन्हें करीब 19 महीने जेल में रहना पड़ा। उनके राजनीतिक जीवन में यह दौर संघर्ष का महत्वपूर्ण अध्याय माना जाता है।
बांसडीह में बच्चा पाठक के राजनीतिक प्रभाव को दी थी चुनौती
बांसडीह विधानसभा क्षेत्र की राजनीति में लंबे समय तक बच्चा पाठक का प्रभाव रहा। वह कई बार विधायक रहे और प्रदेश सरकार में मंत्री भी रहे। राम गोविंद चौधरी ने 2002 में बांसडीह विधानसभा सीट से चुनाव लड़कर जीत हासिल की।
इस जीत को बच्चा पाठक के लंबे राजनीतिक प्रभाव को चुनौती देने वाली महत्वपूर्ण घटना के रूप में दर्ज किया गया था। इसके बाद बांसडीह उनकी राजनीतिक पहचान का प्रमुख केंद्र बन गया था।
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