बलिया: 3 पीढ़ियों से निभाई जा रही रामलीला की विरासत, नगरा में 1930 में रामभक्ति की जलाई अलख आज भी है जीवित
नगरा, बलिया में एक परिवार तीन पीढ़ियों से रामलीला की परंपरा को जीवित रखे हुए है। 1930 में शिवदास पाठक ...और पढ़ें

3 पीढ़ियों से रामलीला के प्रति समर्पित बलिया जिले का एक परिवार
HighLights
नगरा का एक परिवार तीन पीढ़ियों से रामलीला कर रहा।
शिवदास पाठक ने 1930 में रामलीला की नींव रखी थी।
परिवार के सदस्य राम, लक्ष्मण, सीता, रावण के पात्र बनते हैं।
जागरण संवाददाता, बलिया। मंच पर जब दिव्यांश पाठक भगवान श्रीराम का स्वरूप धारण करते हैं, तो उनके साथ परिवार की पीढ़ियों से चली आ रही आस्था भी जीवित हो उठती है। लक्ष्मण के रूप में अमित पाठक का समर्पण, सीता के रूप में संकल्प पाठक का भावपूर्ण अभिनय और रावण के रूप में रवि पाठक की बुलंद आवाज दर्शकों को रामकथा से जोड़ देती है।
नगर पंचायत नगरा की इस रामलीला में पाठक परिवार की 3 पीढ़ियां परंपरा को सहेजने में जुटी हैं। इनके लिए रामलीला महज मंचन नहीं, बल्कि पूर्वजों की विरासत और संस्कारों को आगे बढ़ाने का माध्यम बन गई है।
बाबा ने बोया आस्था का बीज, पीढ़ियों ने आगे बढ़ाया
गांव के 70 वर्षीय प्रहलाद सिंह बताते हैं कि पाठक टोली के शिवदास पाठक धर्म-कर्म में गहरी आस्था रखते थे। उन्होंने साल 1930 में सहयोगियों के साथ भगवान श्रीराम के जीवन चरित्र का मंचन शुरू कराया।
धीरे-धीरे यह आयोजन क्षेत्र की धार्मिक पहचान बन गया। उनके निधन के बाद बेटे शंकर पाठक ने जिम्मेदारी संभाली और रामलीला को व्यवस्थित स्वरूप दिया। समय के साथ जिम्मेदारियां बदलीं, लेकिन परंपरा की डोर नहीं टूटी। आज रमेश पाठक और उनके भाई उमेश पाठक इसे आगे बढ़ा रहे हैं।
पारिवारिक संस्कारों की दिखती है झलक
गांव के एक निवासी रामनारायण प्रसाद कहते हैं कि इस रामलीला की खासियत प्रमुख पात्रों का परिवार के सदस्यों द्वारा निभाया जाना है। अमित पाठक लक्ष्मण के रूप में भाई के प्रति समर्पण दर्शाते हैं, जबकि संकल्प पाठक सीता के किरदार में दर्शकों को भावुक करते हैं।
रवि पाठक के रावण रूपी संवादों पर पंडाल तालियों से गूंज उठता है। राहुल पाठक कुंभकर्ण के अभिनय से दर्शकों का मनोरंजन करते हैं। इन प्रस्तुतियों में अभिनय के साथ पारिवारिक संस्कारों की झलक भी दिखाई देती है।
रामकथा के बहाने जुड़ता है पूरा गांव
नवरात्र में आयोजित रामलीला देखने नगरा सहित आसपास के गांवों से लोग पहुंचते हैं। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक की भागीदारी इसे सामूहिक उत्सव बनाती है। बदलते दौर में भी इस आयोजन के प्रति लोगों का लगाव बना हुआ है।
पाठक परिवार का प्रयास बताता है कि परंपराएं तभी जीवित रहती हैं, जब नई पीढ़ी उन्हें जिम्मेदारी और श्रद्धा के साथ अपनाती है। यहां हर वर्ष मंच पर केवल रामायण के प्रसंग नहीं उतरते, बल्कि पीढ़ियों को जोड़ने वाली आस्था भी जीवित हो उठती होती है।
