मुफ्त आर्ट एजुकेशन से राष्ट्रीय सम्मान तक: बलिया के डॉ. इफ्तखार खान को मिलेगा राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार
बलिया के कला अध्यापक डॉ. इफ्तखार खान वर्ष 2000 से गरीब बच्चों को नि:शुल्क फाइन आर्ट्स की शिक्षा दे रहे ...और पढ़ें
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HighLights
डॉ. इफ्तखार खान बलिया में नि:शुल्क कला शिक्षा देते हैं।
उन्हें 2026 के राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार के लिए चुना गया।
उनके 200 से अधिक शिष्य राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मंच पर सफल।
लवकुश सिंंह, बलिया। आज के दौर में शिक्षा जब बहुत महंगी हो गई है, तब उत्तर प्रदेश में बलिया जिले के राजकीय इंटर कालेज में कला अध्यापक डॉ. इफ्तखार खान बच्चों को निश्शुल्क पढ़ा रहे हैं। वह घर पर गरीब परिवारों के जरूरतमंद बच्चों को फाइन आर्ट्स का प्रशिक्षण देते हैं।
ऐसा वह आज से नहीं, वर्ष 2000 से कर रहे हैं। प्रति रविवार वह अपने आवास पर भी बच्चों को निश्शुल्क कला की शिक्षा देते हैं। उनके इस सेवाभावी नवाचार को अब सम्मान मिलेगा।
शिक्षा मंत्रालय के स्कूल शिक्षा एवं साक्षरता विभाग ने वर्ष 2026 के राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार के लिए देशभर से 48 शिक्षकों का चयन किया है, जिनमें उनका भी नाम है। उनको राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु शिक्षक दिवस (पांच सितंबर) के अवसर पर नई दिल्ली के विज्ञान भवन में सम्मानित करेंगी।
यह उनका पहला सम्मान नहीं है, उनको इससे पहले 50 से अधिक सम्मान मिल चुके है। इतना ही नहीं पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर और पूर्व उपराष्ट्रपति भैरों सिंह शेखावत उनके कार्य की सराहना कर चुके हैं।
बलिया जिले में कला की शिक्षा की औपचारिक व्यवस्था स्कूली पाठ्यक्रम तक सीमित थी। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के प्रतिभाशाली बच्चों के लिए कला (फाइन आर्ट्स) की उच्च शिक्षा या प्रवेश परीक्षाओं की तैयारी के अवसर लगभग नहीं थे। प्रतिभा होने के बावजूद संसाधनों और मार्गदर्शन के अभाव में ऐसे बच्चे आगे नहीं बढ़ पाते थे।
डॉ. इफ्तखार ने इसी खाई को पाटने का काम किया। उन्होंने स्कूल की नियमित ड्यूटी के साथ अपने घर को ही एक निश्शुल्क कला-कक्षा में बदल दिया। बलिया के अलावा गोरखपुर, मऊ और बिहार तक से बच्चे उनके पास फाइल आर्ट्स की प्रवेश परीक्षाओं की तैयारी के लिए पहुंचते हैं। प्रति वर्ष एक ग्रीष्मकालीन चित्रकला कार्यशाला भी आयोजित करते, जिससे बच्चों को अभ्यास और मार्गदर्शन दोनों मिले।
शिष्य राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचे
डॉ. इफ्तखार के मार्गदर्शन में स्कूल के अतिरिक्त अब तक 200 से अधिक विद्यार्थी फाइल आर्ट्स के क्षेत्र में आगे बढ़ चुके हैं। इनमें से कई देश की प्रतिष्ठित कंपनियों में सेवाएं दे रहे हैं, तो कुछ विदेश में भारतीय कला की पहचान बढ़ा रहे हैं। जो बच्चे कभी संसाधनों के अभाव में कला की औपचारिक शिक्षा से वंचित रह सकते थे, वह आज राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंच चुके हैं।
बलिया के नीरज सिंह इनमें एक हैं। 2007 में ददरी मेले में डॉ. इफ्तखार की कला प्रदर्शनी देखने के बाद नीरज की रुचि चित्रकला की ओर जागी। उन्होंने डॉ. इफ्तखार से मुलाकात कर कला सीखने की इच्छा जताई और निश्शुल्क कोचिंग लेना शुरू किया।
परिणाम यह रहा कि नीरज का पहले ही प्रयास में बीएचयू के दृश्य कला संकाय में चयन हो गया, जहां से उन्होंने बैचलर आफ फाइन आर्ट्स (बीएफए) की डिग्री प्राप्त की। इसके बाद पुणे स्थित भारतीय फिल्म और टेलीविजन संस्थान (एफटीटीआइ) से प्रोडक्शन डिजाइन में डिप्लोमा किया। आज नीरज कई फिल्मों में प्रोडक्शन डिजाइनर के रूप में काम कर चुके हैं। वह कहते हैं-डॉ. इफ्तखार सर से मिली शिक्षा ने ही मेरे जीवन की दिशा तय की। उस दिन मेले में उनकी प्रदर्शनी नहीं देखी होती, तो शायद कला की तरफ मेरा रुझान ही न बनता।
गुरु दक्षिणा में पौधा लगाने का वादा
डॉ. इफ्तखार का मानना है कि प्रतिभा किसी आर्थिक स्थिति की मोहताज नहीं होती, जरूरत केवल उसे पहचानने और सही दिशा देने की है। यही सोच उनके पूरे प्रयास का आधार रहा। वह बताते हैं कि एक बार एक बच्चे के अविभावक ने गुरु दक्षिणा देने कि जिद कि तो उन्होंने उनसे एक पौधा लगाने के लिए कहा।
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इसके बाद गुरुदक्षिणा देने वाले बच्चों से सार्वजनिक स्थानों पर पौधा लगाने और उसे बड़ा होने तक उसकी देखरेख करने के लिए प्रेरित करने लगे। डॉ. इफ्तखार की पहल की खूबी यह है कि इसमें बड़े संसाधनों की आवश्यकता नहीं है। एक समर्पित शिक्षक, साप्ताहिक समय और बच्चों तक पहुंचभर से यह शुरू हो सकता है।
50 से अधिक सम्मान, पूर्व प्रधानमंत्री, उपराष्ट्रपति की सराहना
डॉ. इफ्तखार की कला को पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर, पूर्व उपराष्ट्रपति भैरों सिंह शेखावत और पूर्व राज्यपाल डॉ. विष्णुकांत शास्त्री जैसी हस्तियां सराह चुकी हैं। अब तक उन्हें 50 से अधिक सम्मान मिल चुके हैं।
