जागरण संवाददाता, नगरा (बलिया): पशु आश्रय केंद्रों में रखे जाने वाले पशुओं को रेशेदार चारा व गुड़ व राब खिलाने का दावा किया जा रहा है लेकिन हकीकत इसके विपरीत दिख रही है। पशु आश्रय केंद्रों के हालात इतने बदतर हैं कि मवेशियों को गोबर में सना भूसा ही नसीब हो रहा है।

एक बार चहारदीवारी के अंदर करने के बाद न तो जिम्मेदार बेसहारा पशुओं की सुधि ले रहे हैं और न ही खातिरदार। नतीजा यह हो रहा है कि इन बेसहारा पशुओं को खाने के लिए न तो भूसा व चारा मिल रहा है और न ही पीने का पानी। इसका नजारा स्थानीय ब्लाक के समीप पानी टंकी परिसर में बनाए गए अस्थाई गोशाला में देखा जा सकता है। भोजन व पानी के अभाव में यहां रखे गए बेसहारा बछड़ों की दशा दीन-हीन सी हो गई है। खाने के नाम पर या तो गोबर में सना हुआ भूसा नसीब हो रहा है या फिर सड़ा हुआ पुआल।

चार दर्जन से अधिक बछड़ों को किसी तरह दिन में एक बार पानी दिया जा रहा है। यहां रखे गए गोवंशों की हालत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि एक बछड़े की गर्दन रस्सी से कटकर घाव का रूप ले चुकी है, रक्त का रिसाव हो रहा है लेकिन कोई पूछनहार नहीं है।

उक्त अस्थाई गोशाला में क्षेत्र के तकरीबन चार दर्जन बछडों को रखा गया है। बीडीओ व पशुचिकित्साधिकारी के नेतृत्व में इनकी देखरेख के लिए ब्लाक स्तर पर समिति गठित की गई है। इन गोवंशों को दाना-पानी देने की जिम्मेदारी सफाईकर्मी को सौंपी गई है। आश्चर्य की बात तो यह है कि चार दर्जन बछड़ों को खाने के लिए महज तीन नाद की व्यवस्था है। वहीं पीने के पानी के लिए सिर्फ एक पात्र रखा गया है। इन व्यवस्थाओं को देखकर इन बेसहारा पशुओं का अंदाज सहज ही लगाया जा सकता है।

इस गोशाला में पहले केवल दो ही बछड़े थे, जो अब बढ़ कर चार दर्जन के करीब हो गए हैं। अभी भी बछडों को पकड़ कर लाने का क्रम जारी है। संचालन समिति के पदाधिकारी/ बीडीओ रामआशीष ने बताया कि बछड़ों की देखरेख के लिए पर्याप्त व्यवस्था की गई है। दाना-पानी के लिए सफाईकर्मी की ड्यूटी लगाई गई है। जिस बछड़े की गर्दन कटी है उसका उपचार कराया जा रहा है।

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