विजय द्विवेदी, बहराइच :

वे नरकुल की फंटियों से हुनर के नमूने ही नहीं, अपनी तकदीर भी गढ़ते हैं। अपने काम में इतना माहिर हैं कि देखते-ही-देखते चटाई व टोकरी के रूप में इको फ्रेंडली उत्पाद तैयार कर लेते हैं। कई कुल (पीढ़ी) से इस हुनर से आजीविका ही नहीं चलाते, बल्कि समाज में पहचान भी बनाए हुए हैं। इनकी कला के लखनऊ, दिल्ली व पश्चिम बंगाल तक के लोग कायल हैं।

यूं तो नरकुल की टोकरी, डोलची, डलिया, चटाई, गुलदस्ता व अन्य सामानों को बनाने का काम श्रावस्ती, बलरामपुर, गोंडा, लखीमपुर खीरी आदि जिलों में भी होता है, लेकिन बहराइच की बात अलहदा है। अन्य जगह यह काम सीजनल है। यहां पर सालभर चलता रहता है। इस काम में पुरुष ही नहीं, महिलाएं, बच्चे व बुजुर्ग भी शामिल रहते हैं। बदलते वक्त में प्लास्टिक की चटाइयों व टोकरियों के बढ़ते चलन के बावजूद यह हुनरमंद अपनी पहचान बनाए हुए हैं। नरकुल के उत्पाद बनाने वाले नदी के किनारे व जंगलों के बीच से कड़ी मशक्कत के बाद इसे लेकर आते हैं और सुखाने के बाद फंटी बनाकर टोकरी, चटाई आदि तैयार करते हैं।

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पूंजी और बाजार की दरकार :

फखरपुर ब्लॉक के भिलोरा काजी में दर्जनों परिवार कई पीढि़यों से इस काम से जुड़े हुए हैं। दीपनरायन, छोटे लाल बताते हैं कि लखनऊ, दिल्ली व पश्चिम बंगाल तक उनकी बनाई टोकरी व चटाई जाती है, लेकिन यह बिचौलियों के माध्यम से ही होता है, इसलिए उत्पादों की अच्छी कीमत नहीं मिल पाती है। मंगल, अरुण कुमार, शंकर, दुलारे, शंभु, मोती समेत दर्जनों परिवार नरकुल से परिवार चला रहे हैं। रामावती, ननकई व मुन्नी कहती हैं कि नरकुल से बहुत कलात्मक वस्तुएं बनाई जा सकती हैं, लेकिन पूंजी का अभाव और बाजार की कमी इस व्यवसाय को आगे बढ़ने नहीं दे रही है।

Posted By: Jagran

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