बहराइच : आपातकाल के दिनों को लोग आज भी नहीं भुला पा रहे हैं। 19 महीने तक जेल के सीखचों के पीछे रहे लोकतंत्र रक्षक सेनानियों का दर्द छलका और उनकी आंखें भर आईं। 25 जून 1975 को आपातकाल की घोषणा को अंग्रेजी हुकूमत से कम नहीं मानते हैं।

आपातकाल के दिनों को याद कर लोकतंत्र रक्षक सेनानी संघ के जिलाध्यक्ष पं.हनुमान प्रसाद शर्मा की आंखें भर आईं। कहते हैं कि भैया वह दिन दुश्मन को भी नसीब न हो। जेल से कचहरी पर आते-जाते समय उनका मुंह व दोनों हाथ पीछे बांध दिया जाता था। मटेरा के पास शर्मा की गिरफ्तारी तीन जुलाई 1975 को दिखाई गई थी। वे रिश्तेदारी में जा रहे थे, लेकिन पुलिस ने नेपाल भागते समय गिरफ्तारी बताई थी। शर्मा पर डीआईआर की छह व मीसा की एक एफआईआर दर्ज हुई थी। बहराइच, गोरखपुर, अलीगढ़, लखनऊ व फतेहगढ़ की जेलों में रहने के बाद उन्हें 19 माह बाद रिहा किया गया। आपातकाल की त्रासदी झेलने वाले भाजपा के पूर्व विधायक जटाशंकर सिंह कहते हैं कि जेलों के अंदर स्वतंत्र हिदुस्तान था, बाहर बंदी था सारा नागरिक। जिस दिन आपातकाल की घोषणा की गई उस दिन बहराइच में पहले दिन 21 लोग गिरफ्तार किए गए थे। वैसे तो इस दौरान तकरीबन दो हजार लोग गिरफ्तार किए गए थे। वर्तमान में 68 लोगों को लोकतंत्र रक्षक सेनानी व आठ मृतक आश्रितों को पेंशन मिल रही है। पूर्व विधायक बताते हैं कि उन्हें बहराइच, गोरखपुर, नैनी, इलाहाबाद व फतेहगढ़ की जेलों में 19 माह तक रखा गया। तीन अगस्त 1976 को डीआईआर में उन्हें बाइज्जत बरी कर दिया गया, लेकिन जेल से निकलने के पहले उन पर मीसा तामील कर दिया गया। उस दौरान की जुल्म-ज्यादती को देखकर सोचता था कि हर रात की सुबह होती है। इसकी भी सुबह होगी। आपातकाल में नौ माह की जेल की सजा काट चुके जरवल के प्रमोद कुमार गुप्ता कहते हैं कि उनकी गिरफ्तारी उस समय हुई थी जब वह कैसरगंज के कसेरी गांव में मीटिग कर रहे थे। पांच लोगों के साथ उन्हें गिरफ्तार किया गया था। बहराइच जेल में उन्हें निरुद्ध किया गया। थाने से लेकर जेल तक दी गई प्रताड़ना आज भी वे भुला नहीं पाते हैं। पूर्व विधायक रामतेज यादव की गिरफ्तारी अस्पताल चौराहे से उस समय की गई जब वे अस्पताल से वापस घर लौट रहे थे। 26 जून 1975 को गिरफ्तार हुए यादव बताते हैं कि 25 जून की रात ही उनको पुत्ररत्न की प्राप्ति हुई। आपातकाल में जन्में इस लड़के का नाम उन्होंने इमरजेंसी ही रख दिया। तीन माह बहराइच जेल में रखने के बाद उन्हें गोरखपुर, नैनी बरेली जेल की हवा भी खानी पड़ी। इस दौरान उनकी माता जी का स्वर्गवास हो गया था। दाह-संस्कार में भी शामिल नहीं हो सके थे। उस दिन को याद कर यादव भावुक हो जाते हैं। कहते हैं कि हिदुस्तान का वह सबसे खराब दिन था। किराए के मकान में उनका परिवार रहकर किसी तरह गुजर कर रहा था। 19 माह के बाद उनकी भी रिहाई हुई थी।

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Posted By: Jagran

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