बागपत, जेएनएन। महाभारत टालने को पांडवों ने कौरवों से बागपत को इसलिए मांगा था कि यहां की धरा पानी से लबालब थी। आज उसी धरा पर पानी का अकाल हो गया है। वजह है जल संचय थमना और भूजल दोहन बढ़ना। निजी भवन हो या फिर सरकारी यानी अधिकांश भवनों पर रेन वाटर हार्वेस्टिग सिस्टम लगे ही नहीं हैं। अब बूंदों को सहेजने में और देरी की तो फिर बागपत प्रदेश का नया बुंदेलखंड होगा।

केंद्रीय भूजल बोर्ड भूजल स्तर 20 से 26 मीटर गहरे जाने से बागपत के सभी छह ब्लाक वर्ष 2012 में डार्क जोन घोषित कर चुका है। बागपत की धरती में उपलब्ध वार्षिक 49 628 हेक्टेयर मीटर पानी से 48748 हेक्टेयर मीटर पानी निकासी होती है। भविष्य के लिए 326 हेक्टेयर मीटर पानी छोड़ रहे हैं। बागपत के 281 गांव और नौ कस्बों में सैकड़ों स्थानों से अरबों लीटर वर्षा जल बेकार बह जाता है।

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रेन वाटर हार्वेस्टिग से कालोनियां दूर

जंल संचय को लेकर हम कितने गंभीर हैं, इसका अंदाजा इससे लगा सकते हैं कि बागपत शहर में एक भी कालोनी ऐसी नहीं है, जहां आधे भवनों में भी रेन वाटर हार्वेस्टिग सिस्टम लगे हों। सरकारी भवनों में बुरा हाल

जिले में 1130 शासकीय और अर्ध शासकीय भवनों में रेन वाटर हार्वेस्टिग सिस्टम नहीं लगे। स्वास्थ्य विभाग के 190 भवनों, बेसिक शिक्षा विभाग के स्कूलों समेत 455 भवनों, माध्यमिक शिक्षा विभाग के 70, पंचायत विभाग के 150 भवनों, पशुपालन विभाग के 24 भवनों समेत तमाम भवनों में रेन वाटर हार्वेस्टिग सिस्टम नहीं। रेन वाटर हार्वेस्टिग सिस्टम लगवाने पर एक से डेढ़ लाख रुपये खर्च आता है। 307 भवनों में सहेज रहे वर्षा जल

-आइटीआइ कालेज खेकड़ा, सड़क परिवहन विभाग के भवन, कलक्ट्रेट, विकास भवन, दो राजकीय पालीटेक्निक कालेज समेत 307 सरकारी भवनों में रेन वाटर हार्वेस्टिग से 30 करोड़ लीटर वर्षा जल सहेज रहे हैं। 100 वर्ग मीटर में साल में दो लाख लीटर पानी सहेज जाता है।

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भूजल स्तर में गिरावट का ब्योरा

ब्लाक वर्ष 2004, वर्ष 2020

बागपत 09.95, 15.49

बड़ौत 11.36, 17.34

बिनौली 19.35, 26.78

छपरौली 11.04, 15.28

खेकड़ा 11.23, 20.98

पिलाना 10.13, 21.95

(भूजल गिरावट मीटर में)

------------------ 300 मीटर या ज्यादा एरिया के भवनों में रेन वाटर हार्वेस्टिग सिस्टम नहीं लगवाने वालों पर कार्रवाई होती है।

अरविद शर्मा, एई, विकास प्राधिकरण

---- सरकारी भवनों में रेन वाटर हार्वेस्टिग लगवाने का काम चल रहा है। काफी भवनों में ये लग चुके हैं।

-हुब लाल, जिला विकास अधिकारी

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