जेएनएन, बागपत: पता नहीं कांट्रैक्ट फार्मिंग का लोग क्यों विरोध कर रहे हैं, लेकिन हमारी तो इसने किस्मत बदल दी है। इससे बढि़या और क्या होगा कि सब्जियों का दाम देश की टाप मंडी आजादपुर दिल्ली से ज्यादा मिलता है। भुगतान इतना खरा कि रकम सीधे बैंक खाते में पहुंचती है। ऐसा सुखद अनुभव बयां किया उन किसानों ने, जिनके सिसाना गांव में कंपनी तीन दशक से हरी सब्जियां खरीदती हैं।

किसान सुनील कुमार खेत में गाजर और नलकूप के कमरे में रखी कंपनी की प्लास्टिक की खाली कैरेट और कांटा दिखाकर बोले कि वह तीन एकड़ भूमि में सब्जियों की खेती करते हैं। तीन बीघा मूली पैदा की, जिसे कंपनी ने तीन से चार रुपये प्रति किलो के दाम पर खरीदा। मंडी में मूली का दाम डेढ़-दो रुपये ज्यादा नहीं था।

डेढ़ माह की मूली खेती से तीन बीघा में 30 हजार रुपये आमदनी मिली। गाजर 12 से 15 रुपये प्रति किलो का भाव मिल रहा है। दस साल से कंपनी को सब्जियां बेच रहे हैं, लेकिन कभी भुगतान लेट नहीं हुआ। कंपनी खरीदी गई सब्जियों के भुगतान हर सप्ताह बैंक खाते में भेजती है। कांट्रैक्ट फार्मिंग अच्छी है, पर पता नहीं किसान क्यों विरोध करने पर उतरे हैं।

वहीं कंपनी के सेंटर पर शलजम की तौल करा रहे किसान जितेंद्र चौहान बोले कि हमें दिल्ली की आजादपुर सब्जी मंडी से भी

ज्यादा दाम यहां मिलता है। कंपनी सब्जियों के दाम रोज निकालती है, जो मंडियों से ज्यादा भले ही हो लेकिन कम नहीं होता है। आज कंपनी ने नौ रुपये प्रति किलो के के दाम पर शलजम खरीदा, जबकि मंडी में छह-सात रुपये दाम किसानों को मिल रहा है।

नए कृषि कानूनों का जिक्र सुनते ही कहने लगे कि हमें ज्यादा तो कुछ पता नहीं, पर सरकार किसानों के अहित कतई भी नहीं

करेगी। नए कृषि कानून समझने के बाद किसान विरोध नहीं करेंगे। उनकी बात पूरी होती कि रणवीर सिंह बोले कि कंपनी हमारे गांव से 1987 से सब्जियां खरीद रही है। शुरू में किसान कांट्रैक्ट का विरोध करते थे, पर बाद में दूसरों को फायदा होता देखा तो, वे खुद भी कंपनी से कांट्रैक्ट कर सब्जियां बेचने लगे। कंपनी से अच्छा दाम मिलने पर गांव के दर्जनों किसान गन्ना के बजाय गाजर, मूली, शलजम, धनिया, पालक, सरसों, बैंगन, टमाटर, हरी मिर्च और अन्य हरी सब्जियों की खेती करते हैं।

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