बागपत, जेएनएन। आज केशव बहुत खुश था और हो भी क्यों ना आज पूरे दो वर्ष के बाद वह अपनी नानी के घर जा रहा था। कोविड महामारी के कारण दो वर्ष तक उसके पिता ने उसे घर से बाहर नहीं निकलने दिया था और ना ही स्वयं कहीं बाहर घूमने जाते थे । दो दिन के बाद केशव के मामा की पुत्री कविता का जन्मदिन का कार्यक्रम था। इस कार्यक्रम में सम्मिलित होने के लिए केशव अत्यधिक उत्साहित था। वह सोच रहा था कि ननिहाल में जाकर मेरे भाई राघव व कविता के साथ मिलकर खूब सारी बातें करेगा। केशव अपने खयालो मैं ही मग्न था कि बाहर से आवाज आई केशव ओ केशव उसके दादाजी उसे पुकार रहे थे। दादा जी ने उससे कहा की चलो रेलवे स्टेशन पर चलते हैं, ताकि नानी के घर जाने के लिए टिकट बुक कराई जा सके।

स्टेशन पहुंचकर दादा जी ने उसे चॉकलेट दिलाई केशव ने चॉकलेट खाकर रैपर वहीं कोने में फेंक दिया। दादाजी ने उसे डाटा तो उसने कहा कि देखिए दादाजी वहां पर पहले से ही कूड़ा पड़ा हुआ था। किसी ने केले खा कर छिलके वहां पर फेंक दिए थे। जिन पर अब मक्खियां आ जा रही थी। पान गुटखा खाने वालों ने स्टेशन की दीवारों को पिक से रंगीन कर दिया था। रेल की पटरियों और प्लेटफार्म पर भी चिप्स आदि के खाली रेपर यहां वहां पड़े हुए थे। दादाजी ने केशव को समझाया कि रेलवे स्टेशन पटरियां व प्लेटफार्म यह संपत्ति सार्वजनिक है यानी सभी की है। क्योंकि हम सबके दिए टैक्स के द्वारा इनको बनाया जाता है और इनका रखरखाव किया जाता है। इस फैले कूड़े को साफ करने के लिए जो अतिरिक्त पैसा लगेगा वह हम सब का है। इसलिए हमें सार्वजनिक संपत्ति को ना गंदा करना चाहिए ना नुकसान पहुंचाना चाहिए। दादा जी ने केशव को कुछ और उदाहरण भी दिए। उन्होंने कहा कि कई बार कुछ उग्र आंदोलनों के दौरान भीड़ द्वारा सार्वजनिक बसों वह रेल आदि को नुकसान पहुंचा दिया जाता है। जो कि बिल्कुल गलत है। अपनी ही संपत्ति को स्वयं नुकसान पहुंचाना कैसे सही हो सकता है। जबकि किसी भी आंदोलन को शांति पूर्वक लोकतांत्रिक तरीके से भी किया जा सकता है। उन्होंने बताया कि बहुत सी बार सरकारी कर्मचारी सरकार की दी गई सुविधाओं को अपने व्यक्तिगत प्रयोग में लाकर उनका दुरुपयोग करते हैं।

उन्होंने इस तथ्य को समझाने के लिए केशव को प्रसिद्ध अर्थशास्त्री चाणक्य की एक लघु कथा सुनाई। चंद्रगुप्त मौर्य के शासनकाल में उस समय के सबसे प्रसिद्ध अर्थशास्त्री चाणक्य से मिलने के लिए एक बार एक विदेशी यात्री आए। रात्रि का समय था। चाणक्य किसी कार्य में व्यस्त थे। अत: विदेशी यात्री को कुछ समय प्रतीक्षा करनी पड़ी। जब वह चाणक्य के सम्मुख उपस्थित हुए तो चाणक्य ने उन्हें आदर पूर्वक बैठाया तथा दूसरे दीपक को जलाकर पहले दीपक को बुझा कर रख दिया और उस विदेशी यात्री से वार्तालाप करने लगे। जब वह विदेशी यात्री जाने को हुआ तो उसने चाणक्य से कहा कि हे महात्मन मेरे मन में जिज्ञासा है। यदि आप अनुमति दे तो मैं अपना प्रश्न रखु चाणक्य ने कहा निसंकोच कहिए तो विदेशी यात्री ने पूछा हे प्रभु जब मैं आया तो वह दीपक जल रहा था। परंतु आपने उस दीपक को बुझा कर दूसरा दीपक जलाया ऐसा क्यों। तब महान चाणक्य ने कहा कि जब आप आए थे तब मैं सार्वजनिक राज्य के कार्य में व्यस्त था। अत: जो दीपक जल रहा था राज्य के तेल से जल रहा था। परंतु आप मेरे पास व्यक्तिगत कार्य से आए हैं। अत: मैंने आपसे मिलने के पूर्व सार्वजनिक दीपक को बंद करके अपना व्यक्तिगत दीपक जलाया। जोकि मेरे वेतन की राशि की तेल से जलता है। अर्थात सार्वजनिक संपत्ति का प्रयोग केवल सार्वजनिक कार्य के लिए किया जाना चाहिए।

यह सारी बातें सुनकर केशव को सार्वजनिक संपत्ति के सम्मान का अर्थ पूरी तरह समझ मैं आ चुका था और उसने मन ही मन प्रतिज्ञा कर ली कि वह जीवन पर्यंत आज मिली शिक्षा का पालन करेगा।

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अजय गोयल, प्रबंधक, सेंट एंजेल्स पब्लिक स्कूल, बागपत

Edited By: Jagran