बदायूं : लोकतंत्र के महासमर में अब फैसले की घड़ी आ गई है। बदायूं संसदीय सीट पर कई दिग्गजों की प्रतिष्ठा दांव पर लगी हुई है। यहां हैट्रिक लगाने की दहलीज पर खड़े सैफई परिवार के धर्मेंद्र यादव की राह भी आसान नहीं दिख रही है। बेटी संघमित्रा को यहां से चुनाव लड़ा रहे कैबिनेट मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य की साख भी दांव पर लगी हुई है। कांग्रेस से हुंकार भर रहे बदायूं से पांच बार सांसद रह चुके सलीम इकबाल शेरवानी के लिए भी यह चुनाव बहुत अहम है। इस सीट पर चुनाव वोटबैंक की सेंधमारी में उलझा हुआ है। बाजी कौन मारेगा यह तो 23 अप्रैल को मतदान के समय ही संकेत मिल सकेंगे।

वर्ष 1996 से सपा लगातार इस सीट पर काबिज है। धर्मेद्र यादव यहां से लगातार दो बार संसद पहुंच चुके हैं और अब तीसरी बार मैदान में हैं। पिछली बार भाजपा और कांग्रेस-महान दल गठबंधन के अलावा बसपा भी विरोध में थी, लेकिन इस बार बसपा का साथ मिला हुआ है। गठबंधन की वजह से वह खुद को पहले से मजबूत मान रहे हैं, लेकिन लंबे समय तक बसपा में रहे स्वामी प्रसाद मौर्य अब भाजपा में हैं। यहां से उन्होंने अपनी बेटी संघमित्रा को चुनाव मैदान में उतारा है। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि बसपा के वोटबैंक में वह कुछ सेंधमारी भी कर सकते हैं। कांग्रेस और सपा के टिकट पर यहां से पांच बार सांसद रहे सलीम इकबाल शेरवानी इस बार कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं। लंबे समय तक जिले की सियासत में इनका दखल, लोगों से निजी संबंध का फायदा मिल सकता है। इसके अलावा सपा छोड़कर कांग्रेस में आए पूर्व विधायक आबिद रजा का भी उन्हें साथ मिल गया है। यादव-मुस्लिम गठजोड़ को सपा की सफलता का मुख्य वजह माना जाता रहा है, इस बार मुस्लिम वोटरों का रूख भी चुनाव की दशा और दिशा बदल सकता है। बहरहाल, सभी के अपने-अपने दावे हैं, किसी को किसी से कम नहीं आंका जा सकता। यह बात तो तय है कि तीनों प्रत्याशियों में से कोई एक ही जीतेगा, वह कौन होगा यह तो चुनाव परिणाम के वक्त ही पता चलेगा, इनमें से दो प्रत्याशियों जोर का झटका धीरे से जरूर लगेगा।

Posted By: Jagran

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