बेटी का खोया सर्टिफिकेट ढूंढने पहुंचे पिता, और खुल गया यूपी का बड़ा 'फर्जी प्रमाण पत्र रैकेट'
बदायूं में एक पिता द्वारा बेटी का खोया जन्म प्रमाण पत्र ढूंढने के दौरान फर्जी जन्म-मृत्यु प्रमाण पत्र बनाने वाले एक बड़े गिरोह का भंडाफोड़ हुआ है।

एआई इमेज
HighLights
पूर्व कंप्यूटर आपरेटर समेत अन्य पर दर्ज की गई प्राथमिकी, पूरे गिरोह को तलाश रही पुलिस
जागरण संवाददाता, बदायूं। विक्रमपुर चरसौरा के बाबू सिंह अगर अपनी बेटी का खोया हुआ जन्म प्रमाण पत्र निकलवाने न पहुंचे होते तो शायद रुदायन नगर पंचायत की जन्म मृत्यु पंजीकरण पोर्टल की आइडी से बन रहे फर्जी जन्म और मृत्यु प्रमाण पत्रों का खेल न खुलता। बाबू सिंह की बेटी दुर्गा का रिकार्ड ढूंढने के दौरान पता चला कि नगर पंचायत की आईडी क्षेत्र के साइबर कैफे, जनसेवा केंद्रों पर संचालित हो रही है।
इस आइडी से सिर्फ रुदायन या इस्लामनगर के ही नहीं बल्कि उप्र के जिला गोंडा, अलीगढ़, शाहजहांपुर, बरेली, संभल, मुरादाबाद आदि जिलों के जन्म और मृत्यु प्रमाण पत्र बनाए जा रहे थे।
इसके लिए आवेदकों से तीन हजार से लेकर 18 हजार रुपये तक वसूले गए।अब पुलिस ने ईओ की तहरीर पर नगर पंचायत के पूर्व कंप्यूटर आपरेटर वरुण के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कर ली है।
पुलिस पूरे गिरोह का पता लगाने में जुटी है। वहीं सभी प्रमाण पत्र निरस्त करने की प्रक्रिया भी शुरू कर दी गई है। फर्जी जन्म और मृत्यु प्रमाण पत्र के मामले जिले में लगातार सामने आ रहे थे।
नगर पंचायत रुदायन में इस तरह की कोई शिकायत या प्रकरण संज्ञान में नहीं आया था। लेकिन जब बाबू सिंह ने पहुंच कर अपनी बेटी का प्रमाण पत्र निकालने को कहा तो उनके दस्तावेज तलाशे गए। लेकिन कार्यालय में उनकी बेटी से जुड़ा कोई दस्तावेज ही नहीं था।
बातचीत में उन्होंने बताया कि इस्लामनगर में चंदौसी रोड पर स्थित चरसौरा निवासी नईम के जनसेवा केंद्र से प्रमाण पत्र तीन हजार रुपये देकर बनवाया था। इसके बाद कार्यालय की जन्म मृत्यु पंजीकरण पोर्टल की जांच शुरू की गई तो चौकाने वाला डेटा सामने आया।
नगर पंचायत की आईडी से इस दौरान 164 जन्म और मृत्यु प्रमाण पत्र बनाए जा चुके थे। इस पर रुदायन के ईओ ने 22 सितंबर को मामले की जानकारी पुलिस को दी।
पुलिस ने जांच शुरू की तो पता चला कि पूर्व कर्मचारी वरुण ने इस्लामनगर, रुदायन समेत आसपास के कई जनसेवा केंद्र और साइबर कैफे संचालकों को नगर पंचायत की आईडी पासवर्ड दे रखा था।
इनके जरिए ही वह लोग सिर्फ जिले के नहीं बल्कि दूसरे जिलों के भी जन्म मृत्यु प्रमाण पत्र बना रहे थे। इसके लिए मनमाने दाम वसूल रहे थे। पोर्टल पर जो नाम दर्ज थे, उनसे बातचीत में पता चला कि इस गिरोह से जुड़े लोगों ने प्रमाण पत्र के लिए तीन से 18 हजार तक वसूले हैं।
इसके बाद नगर पंचायत के पोर्टल के आइडी पासवर्ड तो बदल दिए गए, लेकिन फर्जी प्रमाण पत्र बनने का सिसिला जारी रहा। 30 सितंबर तक 91 और प्रमाण पत्र जारी हो गए।
यह मामला और चौंकाने वाला था। पता चला कि नगर पंचायत की ईमेल का पासवर्ड भी उसके पास था, जिससे नया पासवर्ड भी उसने हासिल कर लिया। यह जानकारी मिलने पर ईओ ने फिर पुलिस से संपर्क किया, जिस पर अब प्राथमिकी दर्ज हुई है।
28 सितंबर की रात से 29 की सुबह तक बना डाले 91 प्रमाण पत्र
शिकायत के बाद भी फर्जी प्रमाण पत्र बनाने का सिलसिला नहीं रुका। 28 सितंबर की रात से 29 सितंबर तक तो फर्जीवाड़े की बाढ़ आ गई। इस दौरान एक ही रात में 91 प्रमाण पत्र जारी किए गए।
बताते हैं कि शिकायत की भनक लगते ही आरोपित वरुण और उसके सहयोगियों ने एक ही जगह बैठकर रात भर में जितने भी प्रमाण पत्रों के रुपये ले रखे थे, सब बना डाले।
15 लाख से अधिक का खेल कर गए गिरोह के सदस्य
अब तक की जांच में कुल 255 प्रमाण पत्र बनाए जाने की बात सामने आई है। प्रमाण पत्र बनाने के लिए तीन से 18 हजार रुपये तक वसूले गए हैं। ऐसे में हर प्रति प्रमाण पत्र का रेशियों पांच से सात हजार के हिसाब से करीब 15 लाख रुपये इन प्रमाण पत्रों को बनाने के लिए वसूले जाने की बात सामने आई है।
