जासं, सरायमीर (आजमगढ़) : अरबी भाषा के रा, मीम, जाद से मिलकर रमजान बना है। बंदा अपनी रब की मोहब्बत में इस मोकद्दस महीने में 30 रोजा रखकर अपनी बुराईयों को जला देता है। रमजान का रोजा हर तरह से इंसान को नेकी का रास्ता दिखाता है। इस महीने को अल्लाह ने अपना महीना कहा है। जिससे बन्दा पूरे महीने इबादत करे और बुराइयों से तौबा करे। यही वजह है कि रमजान के तीस रोजे जो भी मुसलमान रखता है। उसका पूरा साल बेहतर गुजरता है।

नबी ए करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने बताया है कि यह महीना सब्र का महीना है। सब्र का बदला दुनिया में ईद और आखिरत में जन्नत है। अपना पूरा वक्त रमजान में इबादतों, कुरआन की तलावत में गुजारो। तुम इबादत करोगे तो तुम्हारे आमाल में एक नेकी की जगह सत्तर नेकियां लिख दी जाएगी। बन्दा डरता है कि यह महीना अल्लाह का है। अगर इसमें रोजा, इबादत और तरावीह नहीं पढेंगे तो रब नाराज हो जाएंगे। इस महीने की सबसे बडी़ खासियत यह है कि सभी लोग गिले शिकवे भूलकर आपसी मेल मोहब्बत बढ़ाते हैं। इस महीने में गैर मुस्लिम भी रोजेदार मुस्लिम को रोजा इफ्तार की दावत देता है। एक ही साथ बैठकर दोनों समुदाय के लोग रोजा इफ्तार करते हैं तो पूरा नजारा गंगा-जमुनी तहजीब में तब्दील हो जाता है और भाई-चारा दिखाई देता है। देश में अमन-अमान बहाल होता है।

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Posted By: Jagran