जासं, आजमगढ़ : जो लोग किन्हीं कारणों से पूजा में शामिल नहीं हो सके उनके घर भी छठ मइया का प्रसाद पहुंच गया। इस पर्व को लेकर यह भी मान्यता है कि जिनके घर पूजा नहीं होती उनके यहां भी छठ का प्रसाद पहुंचाया जाता है। गांव-मोहल्लों में प्रसाद वितरण की जिम्मेदारी घर के बच्चों को सौंप दी गई थी। बच्चे पैकेट में प्रसाद लेकर बांटने निकल पड़े थे। दरवाजा खटखटा कर आवाज लगा रहे थे दादी हो, चाची हो प्रसाद ले ला। अगर किसी ने पूछ दिया कि किस चीज का प्रसाद है तो बच्चे तपाक से जवाब दे रहे थे कि अम्मा छठ भुखल रहनी हैं। प्रसाद का एक दाना पाने की लगी होड़

जासं, आजमगढ़ : नदी घाटों पर छठ का प्रसाद लेने की होड़ लगी थी। जिसके घर पूजा नहीं होती है उन लोगों की अभिलाषा यही रहती है कि प्रसाद का एक दाना ही सही लेकिन किसी व्रती के हाथ से प्राप्त हो जाए। कुछ लोग तो ऐसे होते हैं जो व्रती के हाथ से प्रसाद न मिलने पर घाटों पर चढ़ा हुआ प्रसाद खोजते हैं। उसमें भी अगर बेदी पर चढ़ा एक दाना चना मिल जाए तो खुद को धन्य समझ लेते हैं। रात भर होती रही आतिशबाजी

जासं, आजमगढ़ : छठ पूजा के घाटों का नजारा ही अलग रहा। एक ओर छठ पूजा तो दूसरी ओर दीपावली का भी दृश्य उत्पन्न हो रहा था। घाटों पर जल रहे दीपक जहां एक ओर दीपावली का अहसास करा रहे थे वहीं बच्चों द्वारा की जा रही आतिशबाजी संकेत दे रही थी कि अभी तो दीपावली बाकी है। एक-दूसरे को सिदूर लगाकर की मंगलकामना

जासं, आजमगढ़ : छठ पूजा के घाटों पर कई तरह की परंपरा भी दिखी। मान्यता के अनुसार अगर एक सुहागिन दूसरे सुहागिन को पूजा के समय सिदूर लगाती हैं तो छठ मइया दोनों को बराबर आशीर्वाद देती हैं और पुत्र, पति के साथ ही पूरे परिवार के लिए वर्ष भर का समय मंगलकारी रहता है। शायद इसी मान्यता के अनुसार व्रती महिलाएं एक-दूसरे को सिदूर लगाकर मंगलकामना कर रही थीं। मन्नत पूरा होने पर बनाया मंडप,

भरी कोसिया

जासं, आजमगढ़ : छठ पूजा के दौरान घाटों पर तमाम व्रती महिलाओं ने गन्ने का मंडप बनाकर उस पर पीली धोती या साड़ी से सजाया तो वहीं कोसिया (मिट्टी का बना छह दीयायुक्त पात्र) में फल और पकवान भरकर पूजा की। महिलाएं किसी मन्नत के पूरा होने पर ऐसा करती हैं।

Posted By: Jagran

डाउनलोड करें जागरण एप और न्यूज़ जगत की सभी खबरों के साथ पायें जॉब अलर्ट, जोक्स, शायरी, रेडियो और अन्य सर्विस