मुर्गी पालन से उम्मतून निशा संवार रहीं 50 परिवारों का भविष्य, बनीं महिला सशक्तीकरण की मिसाल
बहोरिकपुर-मुरादाबाद की उम्मतून निशां ने कुक्कुट पालन से स्वरोजगार की मिसाल कायम की है। वह प्रतिमाह 30-35 हजार रुपये कमाते ...और पढ़ें

मुर्गी पालन से उम्मतून निशा संवार रहीं 50 परिवारों का भविष्य।
HighLights
उम्मतून निशां ने कुक्कुट पालन से स्वरोजगार शुरू किया।
प्रतिमाह 30-35 हजार रुपये की आय अर्जित कर रही हैं।
50 से अधिक लोगों को रोजगार के लिए प्रेरित किया।
नफीस खां, अयोध्या। हौसले बुलंद हों तो छोटी शुरुआत भी बड़ी सफलता की कहानी लिख सकती है। इसकी मिसाल हैं बहोरिकपुर-मुरादाबाद की उम्मतून निशां, जिन्होंने कुक्कुट पालन को अपनी आजीविका का मजबूत आधार बनाने के साथ करीब 50 महिलाओं और पुरुषों को रोजगार से जुड़ने के लिए प्रेरित किया है। आज वह कुक्कुट पालन के जरिए प्रतिमाह 30 से 35 हजार रुपये तक की आमदनी कर रही हैं।
उम्मतून निशा ने वर्ष 2020 में चांद आजीविका महिला स्वयं सहायता समूह का गठन कर 12 महिलाओं को जोड़ा। इसके बाद स्वरोजगार की दिशा में कदम बढ़ाते हुए 11 जुलाई 2024 को बीएमएम जितेंद्र पांण्डेय व आजीविका मिशन के ब्लॉक प्रभारी भगवानदीन के सहयोग से 200 चूजों के साथ मुर्गी पालन शुरू किया। करीब पांच महीने बाद तैयार हुई मुर्गियों में से 80 को बाजार में बेच दिया, जबकि 120 मुर्गियों को आगे व्यवसाय बढ़ाने के लिए रखा।
उम्मतून निशां ने मुर्गी पालन तक सीमित न रहकर हैचरी के माध्यम से अंडों से चूजे तैयार करने का काम शुरू किया। वह अंडों को हैचरी में रखकर करीब 22 दिनों में चूजे तैयार करती हैं। इसके बाद उन्हें बाजार में बेचती हैं। चूजों के साथ अंडों की बिक्री से भी उन्हें आमदनी होती है।
उन्होंने शुरुआत में ब्लॉक मुख्यालय स्थित हैचरी से 30 रुपये प्रति चूजे की दर से चूजे खरीदे थे। मेहनत और अनुभव के बल पर आज उनका व्यवसाय आगे बढ़ रहा है।
उम्मतून निशां ने अमानीगंज के प्रदीप कुमार, भेलसर की आरती, टांडा खुलासा की गुड्डन तथा मुरादाबाद के अकील और शीशपाल समेत करीब 50 लोगों को कुक्कुट पालन के लिए प्रेरित किया। उनके मुताबिक इस व्यवसाय से जुड़े कई लोग अब प्रतिमाह 10 से 15 हजार रुपये तक कमा रहे हैं।
राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन और स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से ग्रामीण महिलाओं को स्वरोजगार के अवसर मिल रहे हैं। उम्मतून निशां की कहानी बताती है कि सही मार्गदर्शन, मेहनत और अवसर मिलने पर महिलाएं न केवल अपने परिवार की आर्थिक स्थिति सुधार सकती हैं, बल्कि दूसरों के लिए भी रोजगार के दरवाजे खोल सकती हैं। उनकी यह पहल ग्रामीण आत्मनिर्भरता की एक प्रेरक मिसाल है।
