चढ़ावा चोरी मामला: बैंक अफसरों ने किया था आगाह, फिर भी क्यों अनजान बने रहे जिम्मेदार? SIT रिपोर्ट ने खड़े किए सवाल
अयोध्या राम मंदिर चढ़ावा चोरी प्रकरण में एसआईटी ने गंभीर पर्यवेक्षणीय चूकें उजागर की हैं, लेकिन जानकर भी अनजान बने ...और पढ़ें
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राम मंदिर
HighLights
एसआईटी ने राम मंदिर चढ़ावा चोरी में गंभीर चूकें पाईं।
ट्रस्टियों व बैंक अधिकारियों की पर्यवेक्षणीय लापरवाही उजागर हुई।
जानकर भी अनजान बने जिम्मेदारों पर अब तक कार्रवाई नहीं।
लवलेश कुमार मिश्र, अयोध्या। राम मंदिर के चढ़ावा चोरी प्रकरण में यह उजागर हो चुका है कि चोरी की भनक पहले ही मिल गई थी और एसबीआई अधिकारियों ने इसे बताया भी था। कुछ गणना कर्मियों को हटाने की बात पर ट्रस्टी अड़ गए थे।
ऐसा क्यों किया गया, यह तो अभी तक सामने नहीं आया, परंतु एसआईटी ने प्रारंभिक जांच में स्पष्ट लिखा है कि ‘निर्धारित सुरक्षा उपायों के पालन में उत्तरदायी व्यक्तियों द्वारा गंभीर पर्यवेक्षणीय चूकें की गईं, जिससे आपराधिक कृत्य करने का दुस्साहस उन कर्मियों ने किया।’
प्रस्तावना में ही एसआईटी ने यह भी लिखा है कि ‘केवल नकदी गणना प्रक्रिया ही नहीं, बहुमूल्य वस्तुओं के प्रबंधन में भी महत्वपूर्ण प्रणालीगत कमियां विद्यमान थीं। हुंडियों से प्राप्त बहुमूल्य वस्तुओं के संबंध में एक पंजिका संधारित थी, तथापि प्रथम पृथक्करण के समय तत्काल वजन, फोटोग्राफी व सीलिंग की व्यवस्था का एकरूप अनुपालन नहीं किया गया।’ इसके बावजूद जानकार भी ‘अनजान’ बने रहने वालों पर अभी कोई कार्रवाई नहीं हुई है।
SOP बनी पर नहीं हुआ नियम का पालन
राज्य सरकार के आदेश पर एसआईटी ने जब 15 जून से चढ़ावा चोरी मामले की जांच शुरू की थी, तो छह दिनों तक बारी-बारी से ट्रस्टियों चंपतराय व अनिल मिश्र के साथ मंदिर के व्यवस्थापक गोपाल राव और गणना में शामिल रहे कर्मियों, दान के आभूषणों को लेने व रखने वाले और स्टेट बैंक के अधिकारियों व कर्मचारियों से पूछताछ की।
लंबी पूछताछ, निरीक्षण व साक्ष्यों के आधार पर एसआईटी ने अपनी प्रारंभिक रिपोर्ट सौंपी तो 25 जून को आठ लोगाें पर तो एफआईआर हो गई। इनकी पुलिस जांच भी कर रही है, परंतु उन जिम्मेदारों पर कोई कार्रवाई नहीं हुई, जिन पर इसका पर्यवेक्षणीय दायित्व रहा। ट्रस्टियों व बैंक अफसरों ने मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) तो तय की, परंतु किसी नियम का पालन नहीं कराया।
एसओपी पर ट्रस्टी अनिल मिश्र व तत्कालीन बैंक प्रबंधक गोविंद मिश्र ने हस्ताक्षर किए। दानपेटियों को खोलने, नकदी एकत्रित करके इनकी गिनती कराने के लिए कलेक्शन एजेंसी भी हायर की, तो उन्हीं को कर्मचारी बनाया, जिन्हें ट्रस्टियों ने कहा। एसआईटी ने रिपोर्ट में यह बताया भी है कि इसी साल 15 अप्रैल को मनीष यादव की नियुक्ति बैंक कर्मचारी रत्नेश चतुर्वेदी ने उसके ताऊ रामशंकर यादव टिन्नू के कहने पर कराई थी।
पूछताछ तो की गई, पर कोई कार्रवाई नहीं हुई
वह गणना से जुड़ते ही चोरी करने लगा। गणना कक्ष में सीसीटीवी कैमरे तो लगवाए, परंतु कभी संचालन नहीं परखा गया। पुलिस को कैमरों का एक्सेस भी दिया गया, परंतु चोरी खुल जाने के डर से कभी जानकारी नहीं दी गई। रेडियाे मेंटिनेंस आफिसर अर्जुनदेव सिंह परिसर में ही 17 साल तक तैनात रहे।
उन्होंने कैमरों की निगरानी में भी लापरवाही की, लेकिन ट्रांसफर करके अभयदान दे दिया गया। दान के आभूषणों को लेने के बाद उसका स्वरूप बदल दिया गया। हुंडियों में मिलने वालीं बहुमूल्य वस्तुएं रजिस्टर पर अंकित करने में लापरवाही की गई, इसके जिम्मेदार कृष्णदेव तिवारी व अन्य से पूछताछ तो की गई, पर कोई कार्रवाई नहीं हुई।
इसी तरह एसआईएस के सुरक्षाकर्मी बिना तलाशी लिए गणना कर्मियों को जाने देते थे। इसका आदेश देने वाले या लापरवाही करने वाले किसी सुरक्षाकर्मी पर अब तक कार्रवाई नहीं हुई। इनकी तरह ही कई ऐसे लोग हैं, जिन पर सवाल उठे, तमाम आरोप लगे, पूछताछ हुई, एफआइआर दर्ज हुई और जांच शुरू हुई, पर अभी तक कोई कार्रवाई नहीं होने से लोग अचंभित हैं।
