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अयोध्या में सौहार्द की वो कोशिश, जो विवादों में घिर गई; CM योगी ने क्यों याद दिलाया हनुमानगढ़ी का ये किस्सा?

Published: Sat, 11 Jul 2026 09:12 AM (IST)

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 23 साल पहले हनुमानगढ़ी में हुए नमाज के वाकये का जिक्र किया, जो हिंदू-मुस्लिम सद्भाव के ...और पढ़ें

राम मंदिर विवाद के सौहार्दपूर्ण हल के लिए शीर्ष महांत ज्ञानदास ने खेला था यह दांव। जागरण

राम मंदिर विवाद के सौहार्दपूर्ण हल के लिए शीर्ष महांत ज्ञानदास ने खेला था यह दांव। जागरण

HighLights

  1. CM योगी ने 23 साल पुरानी हनुमानगढ़ी नमाज का जिक्र किया।

  2. 2003 में सद्भाव के लिए महंत ज्ञानदास के आवास पर हुई थी।

  3. हिंदू संगठनों के विरोध के कारण यह प्रयास विवादित हो गया।

रघुवरशरण, अयोध्या। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने शुक्रवार को सोहावल ब्लाक मुख्यालय पर जनसभा को संबोधित करते हुए हनुमानगढ़ी में जिस नमाज का उल्लेख किया, वह घटना लगभग 23 साल पुरानी है। ‘हनुमानगढ़ी में नमाज’ के पुनर्स्मरण से व्यापक बहस नए सिरे से शुरू होती लग रही है। साथ ही उस समय के घटनाक्रम के तंतु पुनर्संयोजित किए जाने लगे हैं।

यह 21 नवंबर 2003 की तारीख थी और अवसर आखिरी रोजा का था। रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद नयी करवट ले रहा था। आंदोलन और टकराव का रास्ता छोड़ कर न्यायालय अथवा आपसी सहमति से मंदिर-मस्जिद विवाद के समाधान की संभावना तलाशी जाने लगी थी। सहमति-सद्भाव-समझाैता से इस अभियान को सपा एवं कांग्रेस जैसी पार्टियों का भी समर्थन था और हिंदू धर्माचार्य के रूप में इस अभियान का नेतृत्व बजरंगबली की प्रधानतम पीठ हनुमानगढ़ी से जुड़े शीर्ष महांत ज्ञानदास कर रहे थे।

विवाद के समाधान तक पहुंचने से पूर्व यह संदेश देने की जरूरत थी, कि हिंदू-मुस्लिम साथ बैठ सकते हैं और उनमें संवाद भी स्थापित हो सकता है। यदि हनुमानगढ़ी जैसी पीठ के परिसर से सद्भाव की पहल हो, तो इसका असर और भी बढ़ सकता था। महांत ज्ञानदास का आश्रम हनुमानगढ़ी के विशाल परिसर में होने से यह बहुत आसानी से संभव हो गया।

स्थानीय मुस्लिम नेताओं के संयोजन में 50 से अधिक मुस्लिम उनके आवास पर एकत्र हुए और रोजा इफ्तार तथा नमाज के साथ सद्भाव का संदेश दिया। यद्यपि यह प्रयास सद्भाव की दिशा में जितना फलीभूत हुआ, हिंदूवादी संगठनों के विरोध के चलते विवादित भी हुआ।

सतत विरोध के चलते सद्भाव की मुहिम के सूत्रधार महांत ज्ञानदास को पिछले पांव पर आना पड़ा। मामला न्यायालय तक पहुंचा और महांत ज्ञानदास को यह कहना पड़ा कि हनुमानगढ़ी के परिसर में नमाज अदा करने जैसी घटना की पुनरावृत्ति नहीं होगी। 

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नवाब मंसूर अली ने कराया था हनुमानगढ़ी का जीर्णोद्धार
यह जानना रोचक है कि हनुमानगढ़ी के डीएनए में सहमति-सद्भाव के सूत्र समाहित रहे हैं। आस्था का यह महनीय केंद्र आज किला के जिस आकार में दिखता है, उसके निर्माण का श्रेय नवाब मंसूर अली खां (1739-1774 ई.) को जाता है।

नवाब ने हनुमानगढ़ी का पूरी भव्यता से जीर्णोद्धार कराने के साथ उसके रख-रखाव के भी लिए प्रचुर भूमि और संपदा वक्फ की। नवाब ने इस उदारता का परिचय हनुमानजी के तत्कालीन मुख्य निर्वाहक बाबा अभयरामदास के प्रति कृतज्ञता में दिया। बाबा के आशीर्वाद से ही नवाब के पुत्र को असाध्य बीमारी से मुक्ति मिली थी।