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दीपोत्सव का दशक: दक्षता एवं प्रबंधन का बेमिसाल संगम

Published: Thu, 29 Oct 2026 11:10 PM (IST)

अयोध्या में दसवें दीपोत्सव में तीस लाख दीये जलाए जाएंगे, जो प्रशासनिक दक्षता और जनभागीदारी का प्रतीक है। यह आयोजन ...और पढ़ें

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HighLights

  1. अयोध्या में दसवां दीपोत्सव, तीस लाख दीयों का लक्ष्य।

  2. प्रशासनिक दक्षता, कुशल प्रबंधन और जनभागीदारी का अद्भुत संगम।

  3. रामराज्य की कल्पना को साकार करता यह भव्य सांस्कृतिक आयोजन।

हरि शंकर मिश्र। अयोध्या में मनाए जाने वाले दीपोत्सव के दशक का दृश्यचित्र मन में देखें। सरयू के तट पर संध्या का सिंदूरी रंग गहराएगा और घाट-दर-घाट लाखों बातियां एक साथ झिलमिलाएंगी और तब अयोध्या एक जीवंत प्रार्थना बन जाएगी। दीपोत्सव का यह दसवां संस्करण है और इस बार लक्ष्य तीस लाख दीयों का है। पर इस आयोजन को केवल संख्या से नहीं आंका जा सकता।
जिस नगरी की मिट्टी में रामराज की स्मृति रची-बसी है, वहां जलने वाला हर दीपक उसी आदर्श का प्रतीक है। इसे देखकर कहा जा सकता है कि जहां प्रशासनिक इच्छाशक्ति और कुशल प्रबंधन साथ चलते हैं, जहां आस्था को व्यवस्था की साधना मिलती है, वहां रामराज की कल्पना केवल कथा नहीं रहती, कार्यपद्धति बनने लगती है, कार्यशैली बनने लगती है।

दीपोत्सव की दिव्य यात्रा पर नजर डालते हैं। 2017 में पहले दीपोत्सव में इक्यावन हजार दीये जले थे। इसके बाद वर्ष प्रतिवर्ष यह संख्या बढ़ती गई और विश्व कीर्तिमान बनाने के साथ लोगों में मन में रचती-बसती चली गई। सरयू तट और राम की पैड़ी में जलते दीपों की छवि आंखों में बसाने के लिए हर साल लाखों श्रद्धालु यहां आते हैं। दीपों का बढ़ता ग्राफ संयोग नहीं है। यह मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की राम के प्रति आस्था और उनके कुशल नेतृत्व का परिणाम है। प्रशासनिक दक्षता और कुशल प्रबंधन का जीवंत रूप यहां देखने को मिलता है।

वस्तुतः रामराज की सबसे पहली कसौटी ही सुव्यवस्था है। रामकथा में अयोध्या का वर्णन ऐसे नगर के रूप में आता है जहां प्रजा निश्चिंत है, क्योंकि राज्य अपना दायित्व जानता है। इसी कसौटी पर दीपोत्सव की तैयारियों को देखिए। इस बार दीयों की व्यवस्था छप्पन घाटों पर होगी, जबकि पहले यह पचपन घाटों तक सीमित थी।

दीयों को एक समान पंक्तियों में सजाने के लिए ब्लॉक आधारित लेआउट अपनाया जाता है और मार्किंग का काम तीन-चार दिन में पूरा करने का लक्ष्य है। तीस लाख दीये किसी मैदान में ढेर नहीं लगाए जाते। उन्हें सीढ़ी-दर-सीढ़ी, पंक्ति-दर-पंक्ति इस तरह रखना होता है कि संध्या को वे एक अखंड ज्योति-रेखा बन जाएं। यह ज्यामिति, तालमेल और समय-प्रबंधन की साधना है।

इस पूरे आयोजन में दूरदर्शिता का एक सबल पक्ष है। लक्ष्य तीस लाख का है, पर तैंतीस लाख दीये मंगवाए गए हैं, ताकि परिवहन में टूटने वाले दीयों की भरपाई हो सके। यह संकट के बाद उसे सुलझाने वाली नहीं, संकट से पहले उसका हिसाब लगा लेने वाली सोच है। रामराज का एक सूत्र यही है कि शासन वही श्रेष्ठ, जो प्रजा को कठिनाई आने से पहले उसकी चिंता कर ले। सुशासन की पहचान अक्सर ऐसे ही अदृश्य निर्णयों में छिपी होती है, जिनके कारण कुछ गड़बड़ होती ही नहीं।

रामराज की दूसरी कसौटी सहभागिता है। राम का राज्य वह था, जिसमें निषादराज, शबरी, वानर और रीछ सब अपने को उसका भागीदार समझते थे। इस आयोजन में भी वही भाव दिखता है। तीस डिग्री कॉलेजों, चालीस इंटरमीडिएट कॉलेजों और विश्वविद्यालय परिसर से लगभग पैंतीस हजार स्वयंसेवक तैनात होंगे। उन्हें घाटवार जिम्मेदारियां दी जाएंगी, प्रशिक्षण के साथ पहचान पत्र मिलेंगे। विश्वविद्यालय और जिला प्रशासन मिलकर दीयों, घाट प्रबंधन, स्वयंसेवकों की तैनाती और सुरक्षा मानकों की व्यवस्था संभाल रहे हैं।
जो विद्यार्थी आज घाट पर दीपक सजाता है, वह इस उत्सव का दर्शक नहीं, रचयिता है। शिक्षा संस्थान, प्रशासन और समाज का यह त्रिकोण बताता है कि शासन यहां ऊपर से आदेश देने वाली मशीन नहीं, सबको साथ लेकर चलने वाला संयोजक है। नई पीढ़ी के हाथों में दीपक रखना, यानी उसे यह सिखाना कि समाज की रोशनी सबके साझे प्रयास से जलती है, रामराज की सबसे सुंदर शिक्षा है।

इसके पीछे का आध्यात्मिक भाव दीपक की लौ में ही है। दीपावली का मूल संदेश अंधकार पर प्रकाश की विजय है, उस प्रार्थना का साकार रूप जिसमें साधक अंधकार से ज्योति की ओर ले जाने की याचना करता है। अयोध्या में यह भाव दोहरी गहराई पा लेता है। यही वह भूमि है जहां चौदह वर्ष के वनवास के बाद राम लौटे थे और नगरवासियों ने घर-घर दीप जलाकर अपना हर्ष प्रकट किया था।
उस दिन का उजाला केवल राजा के लौटने का उत्सव नहीं था। वह इस विश्वास का उत्सव था कि अब धर्म, न्याय और मर्यादा का शासन लौटेगा। सदियों की प्रतीक्षा के बाद रामलला जब अपने भव्य मंदिर में विराजे, तब वह स्मृति जीवित वर्तमान बन गई। तुलसीदास ने रामराज का जो चित्र खींचा है, वहां दैहिक, दैविक और भौतिक ताप किसी को नहीं सताते। वह आदर्श आज भी प्रासंगिक है और उच्चस्तरीय शासकीय व्यवस्था का पैमाना भी है।

इस आयोजन के बहाने सरकार का संदेश भी स्पष्ट है। पहला संदेश यह कि रामराज की आकांक्षा मंदिर की दीवारों तक सीमित नहीं, वह सुशासन की कार्यशैली में उतरनी चाहिए। श्रद्धा का उत्सव भी अनुशासन मांगता है और अनुशासित उत्सव ही सच्चे अर्थ में श्रद्धा का सम्मान है। दूसरा यह कि सांस्कृतिक पुनर्जागरण और आधुनिक प्रबंधन परस्पर विरोधी नहीं, एक-दूसरे के पूरक हैं। जो समाज अपनी परंपरा पर गर्व करता है, वही उसे तकनीक, योजना और पारदर्शिता की भाषा में संवार भी सकता है। तीसरा यह कि रामराज का अर्थ अंतिम पंक्ति के व्यक्ति तक उत्सव और अवसर का पहुंचना है।

इसी में आजीविका का पक्ष जुड़ा हुआ है। यह आयोजन स्थानीय अर्थव्यवस्था को बल देता है, स्थानीय व्यवसायों को बढ़ावा मिलता है और रोजगार के अवसर बनते हैं। लाखों श्रद्धालु और पर्यटक अयोध्या पहुंचते हैं। मिट्टी के दीये गढ़ने वाले हाथ, तेल-बाती जुटाने वाले व्यापारी, ठहरने-खाने की व्यवस्था संभालने वाले परिवार और ढुलाई करने वाले श्रमिक, सबके चूल्हे में इस उजाले की आंच है।
जब उत्सव रोजगार से जुड़ता है, तब आस्था की पवित्रता में सामाजिक न्याय का अर्थ भी जुड़ जाता है। रामराज में प्रजा का सुख ही राजा का सुख माना गया है, और दीपोत्सव उस भावना को आज की भाषा में कहने का एक प्रयास है।

अंत में फिर विषय की केंद्रीय वस्तु दीपक पर लौटते हैं। दीपक की सबसे बड़ी सीख यह है कि वह स्वयं जलकर दूसरों का पथ आलोकित करता है। यही राजधर्म का सार है, कि सत्ता स्वयं तपकर प्रजा के लिए प्रकाश बने। जब संध्या को पहली बाती जलेगी और देखते-देखते घाटों की सीढ़ियां स्वर्णिम आभा से भर उठेंगी, तब उस प्रकाश में महीनों की तैयारी का श्रम, हजारों युवाओं का उत्साह, अधिकारियों की रातों की जगाहट और एक नगर की सदियों पुरानी प्रतीक्षा होगी।
तीस लाख दीप जब सरयू के जल में अपना प्रतिबिंब देखेंगे, तब वह उजाला दोहरा होगा, एक आकाश की ओर उठता हुआ और एक जल में उतरता हुआ। मानो पूरी रामनगरी कह रही हो कि रामराज दूर का स्वप्न नहीं, हर घर में, हर घाट पर और हर शासन-निर्णय में एक दीपक की तरह जलाए रखने योग्य संकल्प है।

(रामकथा में अयोध्या का वर्णन ऐसे नगर के रूप में आता है जहां प्रजा निश्चिंत है, क्योंकि राज्य अपना दायित्व जानता है। इसी कसौटी पर दीपोत्सव की तैयारियों को देखिए।)

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।