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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Apr 06, 2021 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

आस्था के मंदिर में जल की भी 'पूजा'

By JagranEdited By:
Published: Tue, 06 Apr 2021 11:19 PM (IST)

जागरण संवाददाता औरैया हमारी प्रकृति पंचतत्वों अर्थात भूमिजल अग्नि वायु एवं आकाश के संतु

आस्था के मंदिर में जल की भी 'पूजा'
आस्था के मंदिर में जल की भी 'पूजा'

जागरण संवाददाता, औरैया: हमारी प्रकृति पंचतत्वों अर्थात भूमि,जल, अग्नि, वायु एवं आकाश के संतुलन पर टिकी है। प्राचीन काल में ऋषियों ने इन तत्वों के संतुलन पर अत्यधिक जोर दिया। लेकिन, आज की भागदौड़ भरी जिदगी व रहन-सहन का तौर-तरीका कहीं न कहीं इन तत्वों पर असर डाल रहा है। यही वजह है कि आज पानी का संकट गहराता चला जा रहा है। लेकिन,पानी की कीमत की असल जानकारी लेनी हो तो स्थानीय देवकली मंदिर जरूर जाएं। 250 वर्ष पुराना देवकली मंदिर जल संरक्षण का बड़ा संदेश देते दिखता है। इस मंदिर को शिवलिग महाकालेश्वर देवकली मंदिर भी कहा जाता है। मंदिर की छतों व भगवान शिव के नित्य जलाभिषेक का पवित्र जल बने कुंड से भूगर्भ में ले जाने की व्यवस्था पुरानी सोच पर आधारित है। जो करीब 250 वर्ष से निरंतर चली आ रही है। इस पहल को आज भी धरोहर के रूप में सहेजा जा रहा है। पुरातत्व विभाग के प्रमाणों के अनुसार करीब 1200 वर्ष पूर्व स्थापित शिवलिग महाकालेश्वर इस समय देवकली मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है। करीब 7500 वर्ग फीट में बने इस मंदिर निर्माण के समय भविष्य के जल संकट को ध्यान में रखकर जल संरक्षण को विशेष महत्व दिया। बारिश के दिनों में मंदिर की छत व परिसर में जमा होने वाला पानी भी इस मंदिर में सहेजा जा रहा है।

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मंदिर के इतिहास पर एक नजर

भारत प्रेरणा मंच के महासचिव अविनाश अग्निहोत्री का कहना है कि पुरातत्व विभाग के प्रमाण के अनुसार मंदिर में स्थापित शिवलिग नौवीं सदी से जुड़ी है। उस समय यह क्षेत्र प्रतिहार वंश द्वारा शासित वंश का हिस्सा था। इस वंश के सबसे प्रतापी राजा मिहिर भगवान शिव के अनन्य उपासक थे। उन्होंने राज्य में जगह-जगह शिवालयों की स्थापना करवाई थी। उन्हीं में से एक देवकली में स्थापित शिवलिग है। 1095 ईसवी में इसका जीर्णोद्धार कर मंदिर बनवाया। 1125 ईसवी में राजा जयचंद ने अपनी मुंह बोली बहन देवकला का विवाह जालौन के राजा विसोक देव से किया। तब उन्होंने इस क्षेत्र सहित 145 गांव दहेज में दिए थे। साथ ही उन्हीं के नाम पर नामकरण कर देवकली मंदिर रखा। यमुना घाट पर विश्रांत घाट का निर्माण करवाया। 1772 में मराठा छत्रप सदाजी भाउ राव ने इटावा सहित यह क्षेत्र अपने अधिकार में लेकर मराठा शैली में मंदिर को स्वरूप प्रदान किया। स्वाधीनता संग्राम में इस मंदिर को क्रांतिकारियों ने अपनी शरणस्थली के रूप में प्रयोग किया था।