अमरोहा, जेएनएन। बावनखेड़ी नरसंहार की विवेचना पुलिस महकमे में इतिहास के पन्नों में दाखिल हो गई है। तत्कालीन इंस्पेक्टर आरपी गुप्ता ने इस जिम्मेदारी को बखूबी निभाते हुए मात्र 52 दिन के भीतर अदालत में चार्जशीट दाखिल कर दी थी। 300 पन्नों की चार्जशीट में उन्होंने साक्ष्यों के साथ 45 गवाह भी बनाए थे। जिसके बूते सेशन कोर्ट ने दो साल के भीतर ही अपनों की कातिल शबनम व उसके प्रेमी सलीम को फांसी की सजा सुनाई थी। 

यह है मामला 

14 अप्रैल 2008 की रात को हसनपुर के गांव बावनखेड़ी में प्रेमी सलीम के साथ मिलकर मास्टर शौकत सैफी की इकलौती बेटी शबनम ने अपने ही परिवार के सात लोगों का गला काट कर उन्हें मौत की नींद सुला दिया था। उस समय हसनपुर कोतवाली के प्रभारी निरीक्षक बाबूराम सागर थे। घटना के बाद स्थानीय लोगों ने वहां पर जाम लगा दिया था तथा पर्दाफाश करने की मांग की थी। लिहाजा तत्कालीन आइजी गुरुवचन लाल ने बाबूराम सागर को निलंबित करते हुए अमरोहा के प्रभारी निरीक्षक आरपी गुप्ता को हसनपुर का चार्ज देकर तफ्तीश सौंपी थी। 15 अप्रैल को आरपी गुप्ता ने चार्ज संभालने के बाद ङ्क्षबदुवार जांच शुरू की तो परतें उधड़ती चली गई। उन्होंने 18 अप्रैल को सलीम को गिरफ्तार कर लिया था। उसने बगैर सख्ती के ही सारा घटनाक्रम उन्हें बता दिया था। उसके बाद शबनम को भी गिरफ्तार कर लिया गया। दोनों को जेल भेजने के बाद आरपी गुप्ता पर निष्पक्ष विवेचना की जिम्मेदारी थी। केवल जिले के लोग ही नहीं बल्कि देशभर की निगाह आरपी गुप्ता की कलम पर टिकी हुई थी। श्री गुप्ता ने निर्धारित 30 दिन से पहले ही मात्र 52 दिन के भीतर 300 पन्नों की चार्जशीट अदालत में दाखिल कर दी थी। इसमें उन्होंने साक्ष्यों के साथ 45 गवाह भी बनाए थे। दो साल तक तत्कालीन जिला जज की अदालत में मुकदमे की सुनवाई हुई। अप्रैल 2010 में तत्कालीन जिला जज एए हुसैनी ने इस नरसंहार पर अपना फैसला सुनाया था। उन्होंने शबनम व सलीम को फांसी की सजा सुनाई थी। 

सजा समाज के लिए बनेगी नजीर 

अपनों की कातिल शबनम के लिए यदि फांसी से भी बड़ी सजा है तो वह मिलनी चाहिए। उसने खून के रिश्तों के भरोसे का कत्ल भी किया था। उसे जल्दी से जल्दी फांसी के फंदे पर लटकाया जाना चाहिए। यह घटना पुलिस में मेरे सेवाकाल की सबसे बड़ी व जघन्य घटना थी। शबनम को मिली सजा समाज के लिए नजीर बनेगी। 

आरपी गुप्ता, विवेचक बावनखेड़ी कांड

 

Posted By: Narendra Kumar

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