अमेठी : रमजान शरीफ का अलविदा जुमा आज है। अलविदा जुमा की नमाज अदा करने के लिए हर वर्ष नगर की जामा मस्जिद सहित विभिन्न मस्जिदों पर नमाजियों की भारी भीड़ उमड़ती थी। लेकिन, पिछले साल की तरह इस साल भी अलविदा जुमा की नमाज में कोरोना संक्रमण के चलते रोजेदारों को शारीरिक दूरी का पालन का करना होगा। इसके लिए रोजादार जामा मस्जिद सहित विभिन्न मस्जिदों पर इमामे जुमा सहित केवल पांच नमाजी ही अलविदा की नमाज अदा कर सकेंगे।

इस्लाम धर्म में आखरी जुमा, जिसे आमतौर पर अलविदा जुमा कहते हैं। बहुत अहमियत है। इमामे जुमा जामा मस्जिद, सज्जादानशीन मौलाना सलमान अशरफ कहते हैं कि मोहम्मद साहब का कथन है कि जुमा कि दिन अफजल तरीन दिन है। इस दिन हजरत आदम को पैदा किया गया, इसी दिन हजरत आदम को जन्नत में दाखिल किया गया। इसी दिन हजरत आदम को जमीन पर उतारा गया। इसी जुमा के दिन कयामत (महाप्रलय) आयेगी। इसलाम धर्म में इबादत के लिए इसी जुमा का चयन किया गया। जबकि नसारा धर्म के लोगों ने अपनी इबादत का दिन शनिवार, यहूदियों ने रविवार का दिन चुना है।

शिया जामा मस्जिद के इमाम मौलाना सैयद तिरिम्माह हैदर, शिया धर्म गुरु मौलाना जर्रार हुसैन ने कहा है कि रमजान शरीफ का आखरी जुमा हमें ये एहसास दिलाता है कि अब रमजान शरीफ समाप्त हो रहा है। इसी के साथ ही वह साअतें जो बरकतों और रहमतों वाली हैं और जिन साअतों (घड़ी) में अल्लाह ताला ने हमारे गुनाहों की मगफिरत (माफी) करायी। वह भी रुखसत हो जायेंगी।

अलविदा जुमा अब हमसे यह सवाल करता है कि हर शख्स अपना अध्ययन करे और थोड़ी देर एकान्त में बैठकर अपने अमल अर्थात क्रिया कलापों पर चितन करें कि वह किस फेहरिस्त में है। जाकिरे अहलेबत सईदुजजमा नकवी कहते हैं कि मोहम्मद साहब का इरशाद है कि शहरों में मक्का, महीनों में रमजान और दिनों में जुमे का दिन तथा रातों में शबे कद्र सबसे अफजल व पवित्र है।