प्रयागराज, जेएनएन। भूत भावन भोलेनाथ के ब्याह की रात महाशिवरात्रि इस बार अद्भुत संयोग के साथ आई है। शश और सर्वार्थ सिद्धि योग के अनूठे मिलन के बीच जो भक्त रुद्राभिषेक करके इस दिन प्रभु शिव की आराधना करते हैं उनकी सभी मनोकामना पूरी होती है। शिवरात्रि श्रवण नक्षत्र युक्त मध्यरात्रि व्यापिनी चतुर्दशी के संयोग में शश तथा सर्वार्थ सिद्धि योग के साथ मनाई जा रही है। यह सिद्धि योग महाशिवरात्रि के दिन शुक्रवार की सुबह  9.12 से शुरू है जिसका मान कल यानी शनिवार की सुबह 6.54 तक रहेगा।

ज्‍योतिषाचार्य बोले, जब चंद्रमा से केंद्र में शनि स्वग्रही होता है तो शश योग बनता है

ज्योतिषाचार्य नागेश दत्त द्विवेदी ने बताया कि जो लोग ऐसे संयोग में गौरीशंकर का अभिषेकात्मक अर्चन करते हैं उनको अन्य दिनों की अपेक्षा कई गुना अधिक फल मिलता है। कहा कि जब चंद्रमा से केंद्र में शनि स्वग्रही होता है तो शश योग बनता है। पंचमहापुरुष योग में एक माना जाने वाला यह शुभ योग शनिकृत पीड़ा से मुक्ति दिलाने में विशेष सहायक होता है। इस महाशिवरात्रि पर जो भक्त दिन या रात्रि में घर अथवा शिवालय में षोडशोपचार पूजन करके शिवलिंग पर अभिषेक करेंगे, भोले की साधना करेंगे उनका मनोरथ अवश्य पूर्ण होगा। 

दूर होगी साढ़े साती, ढैय्या

शश और सर्वार्थ सिद्ध योग एक साथ बनने से शनि की साढ़ेसाती, ढैय्या अथवा किसी भी पापग्रह से यदि व्यक्ति पीडि़त है तो शिव की भक्ति उसकी पीड़ा को दूर करने में सहायक होगी। इस अवसर पर एक ग्रहीय लीला और हो रही है वह है पांच ग्रहों की पुनरावृत्ति। शनि व चंद्र मकर राशि, शुक्र मीन राशि, गुरु धनु राशि तथा बुध कुंभ राशि में रहेंगे। ग्रहों का यह स्वरूप सन् 1961 के बाद अब फिर बना है।

रुद्राभिषेक की महिमा

भगवान सदाशिव की उपासना में यजुर्वेद की रुद्राष्टाध्यायी के द्वारा अभिषेक रूपी पूजन का विशेष स्थान है। भगवान शिव के समस्त उपासना वेदराशि के मध्य मणि के रूप में यह अभिषेक रूपी आराधना विराजमान है। 

'जलधारा प्रिय- शिव'

भगवान शंकर को अभिषेक अत्यधिक प्रिय है। शिव की प्रसन्नता के लिए गंगाजल के अलावा रत्नोदक, इक्षुरस, दुग्ध, पंचामृत आदि अनेक द्रव्यों से रुद्राष्टाध्यायी के मंत्रों द्वारा अभिषेक किया जाता है। एकादशिनी रुद्री की 11 आवृति होने पर लघुरुद्र की संज्ञा दी गई है। लघुरुद्र की 11 आवृत्ति होने पर महारुद्र कहा जाता है। महारुद्र की 11 आवृत्ति होने पर अतिरुद्र होता है। इस प्रकार शास्त्रों में इन तीनों अनुष्ठानों की महिमा बताई गयी है। इन सभी में भगवान रुद्र का अभिषेक प्रधान है।

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