प्रयागराज, जेएनएन। उत्तर प्रदेश की योगी सरकार के श्रम विभाग, चिकित्सा व स्वास्थ्य विभाग ने इलाहाबाद हाई कोर्ट को दूसरे राज्यों से आये श्रमिकों व कामगारों के पुनर्वास और कोरोना वायरस के फैलाव को रोकने के लिए उठाये गए कदमों की जानकारी दी। हाई कोर्ट ने याची से सरकार द्वारा पेश जानकारी पर जवाब मांगा है। याचिका पर अगली सुनवाई नौ जून को होगी।

यह आदेश मुख्य न्यायाधीश गोविंद माथुर व न्यायमूर्ति रमेश सिन्हा की खंडपीठ ने अधिवक्ता ऋतेश श्रीवास्तव तथा गौरव त्रिपाठी की जनहित याचिका पर दिया है। हाई कोर्ट ने राज्य सरकार से दूसरे राज्यों से आ रहे मजदूरों व उनके परिवार के इलाज, पुनर्वास सहित ग्रामीण क्षेत्रों में कोरोना वायरस फैलने से रोकने की नीति व मानक के बारे में जानकारी मांगी थी। हाई कोर्ट ने यह भी पूछा था कि बाहर से लौटकर आये मजदूरों के जीविकोपार्जन के लिए प्रदेश में पुनर्वास की क्या योजना है? उसके जवाब में मुख्य स्थायी अधिवक्ता ने दस्तावेज दाखिल किया है।

याचिका में कहा गया कि प्रत्येक नागरिक को देश के किसी कोने में जीविकोपार्जन के लिए जाने और निवास का सांविधानिक अधिकार है। मजदूरों की मेहनत के बल पर विकास करने वाले राज्यों का वैधानिक दायित्व है कि वह उन्हें भूख से बेहाल होकर राज्य छोड़ने को विवश न करें। सरकार उनके रहने व खाने का इंतजाम करें। याची का कहना है कि मजदूर सड़कों पर भूखे-प्यासे परिवार सहित अपने राज्य के लिए निकल पड़े हैं। ट्रेनों में उनके खाने का इंतजाम नहीं है। खाने को लेकर स्टेशनों पर अफरातफरी मचाने की घटनाएं हुई हैं। याचिका में मजदूरों को मानव गरिमा के साथ भोजन व्यवस्था करने का समादेश जारी करने की मांग है।

बता दें कि यूपी सरकार का दावा है कि बाहरी राज्यों से सर्वाधिक 30 लाख कामगार/श्रमिक उत्तर प्रदेश में आए हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का मानना है कि ये हमारी ताकत हैं। इन्हें सामाजिक-आर्थिक सुरक्षा देने और उनके व्यवस्थित पुनर्वास के लिए हमारी सरकार कामगार (सेवायोजन व रोजगार) कल्याण आयोग गठित करने जा रही है। लॉकडाउन के दौरान भी प्रदेश में 119 चीनी मिलें, 12 हजार से ज्यादा ईंट-भट्ठे और ढाई हजार से अधिक कोल्ड स्टोरेज चले जिनमें 25 लाख लोगों को रोजगार मिला। बंदी के दौरान प्रदेश के 94 फीसद उद्यमों में श्रमिकों को 1700 करोड़ रुपये मानदेय और वेतन दिलाने की व्यवस्था कराई गई।

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