प्रयागराज, जेएनएन। सिर्फ ड्यूटी के लिए उत्तर प्रदेश सिविल पुलिस में भेजे गए 896 पीएसी जवानों का प्रमोशन निरस्त कर मूल संवर्ग पीएसी में आरक्षी के पद पर वापस कर दिया है। उत्तर प्रदेश सरकार के इस आदेश को इलाहाबाद हाई कोर्ट में याचिका दाखिल करके चुनौती दी गई है। इस पर न्यायमूर्ति मनोज कुमार गुप्ता सुनवाई कर रहे हैं।

याचिकाकर्ता हेड कांस्टेबल पारसनाथ पांडेय व अन्य का कहना है कि 20 वर्ष की सेवा के बाद सिविल पुलिस से पीएसी में वापस भेजना शासनादेश के विरुद्ध है। बिना सुनवाई का मौका दिये पदावनति देकर तबादला करना नैसर्गिक न्याय के खिलाफ है। याचिका पर न्यायमूर्ति मनोज कुमार गुप्ता सुनवाई कर रहे हैं। अगली सुनवाई 28 सितंबर को होगी।

याचिका में कहा गया है कि नौ सितंबर व 10 सितंबर 2020 को पारित डीआइजी स्थापना, पुलिस मुख्यालय व अपर पुलिस महानिदेशक पुलिस मुख्यालय के आदेशों से पदावनति देकर याचियों का तबादला कर दिया गया। प्रदेश के विभिन्न जिलों में तैनात 896 हेड कांस्टेबलों को पदावनत करके कांस्टेबल बना दिया गया है। साथ ही उन्हें पीएसी में स्थानांतरित कर दिया गया है। इस पर अपर महाधिवक्ता मनीष गोयल ने शासन से जानकारी लेने के लिए कोर्ट से तीन दिन का समय मांगा है। वहीं, याचिकाकर्ताओं की तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता विजय गौतम ने कोर्ट से पदावनति आदेश पर रोक लगाने की मांग की।

बता दें कि सिर्फ ड्यूटी के लिए सिविल पुलिस में भेजे गए 932 पीएसी जवानों को जुगाड़ और सेटिंग से पुलिस के कोटे में ही प्रमोशन दे डाला। पीएसी के ही एक जवान ने हाई कोर्ट में याचिका डाली तो पूरे महकमे की कलई खुल गई। इन 932 में से 14 तो अपनी सेवा भी पूरी कर चुके हैं। बाकी 896 के प्रमोशन निरस्त कर 22 आरक्षी समेत सभी को मूल संवर्ग पीएसी में आरक्षी के पद पर वापस कर दिया है।

दरअसल, उत्तर प्रदेश में पीएसी के आरक्षी जितेंद्र कुमार ने अपना प्रमोशन नागरिक पुलिस में मुख्य आरक्षी पद पर न होने पर हाई कोर्ट में 2019 में याचिका डाली। उसमें आरक्षी से मुख्य आरक्षी पद पर प्रमोशन पाए पीएसी संवर्ग के ही सुनील कुमार यादव, दिनेश कुमार चौहान और देव कुमार सिंह का उल्लेख किया गया। न्यायालय छह सप्ताह में याची के प्रत्यावेदन पर निर्णय के आदेश पुलिस मुख्यालय को दिए। उसके बाद पुलिस महानिदेशक ने चार सदस्यीय समिति बनाकर जांच कराई तो रिपोर्ट में सारा खेल उजागर हो गया।

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