प्रयागराज, जेएनएन। हमारा देश हमेशा से संपूर्ण विश्व की पहचान एक परिवार के रूप में करता आया है। यही हमारे सनातन धर्म का मूल है। सनातन धर्म के माध्यम से संतों की सत्ता को श्रेयस्कर माना गया है। यह बातें रविवार को आराधना महोत्सव में स्वामी वासुदेवानंद जी महाराज ने भक्तों को संबोधित करते हुए कहीं।

सृष्टि के आदिकाल से कलियुग के आगमन तक का ब्रह्म ज्ञान कराया

आराधना महोत्सव में हो रही श्रीमद भागवत कथा में महंत रामानंद दास ने श्रीमद्भागवत महापुराण कथा के माध्यम से सृष्टि के आदिकाल से कलियुग के आगमन तक का ब्रह्म ज्ञान कराया। उन्होंने ब्रह्म के विभिन्न अवतारों का कारण, उसके उद्देश्य के साथ ही उनके कार्यों में आने वाली बाधाओं की बड़े सरल ढंग से व्याख्या की। उन्होंने कहा कि प्रत्येक मनुष्य को अपने जीवन में भी शास्त्रों में वर्णित सूत्रों, सिद्धांतों के साथ ही बताए गए आचरणों का पालन करना चाहिए। ऐसा करने से मनुष्य स्वयं और समाज को भी सांसारिक मायाजाल व कष्टों से सुरक्षित रख सकता है।

भगवान और गुरु पूजन भक्तों ने किया

श्रीमद्भागवत महापुराण कथा के शुरू में हनुमान जी, गणेश जी, भगवान राधामोहन जी, जगद्गुरु आदि शंकराचार्य, शंकराचार्य ज्योतिष पीठाधीश्वर ब्रह्मलीन स्वामी शांतानंद सरस्वती जी, शंकराचार्य स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती जी की प्रतिमाओं पर माल्यार्पण और आरती-पूजन किया गया। इस दौरान काफी संख्या में भक्तगण मौजूद रहे।

उल्‍लास के साथ मनाई गई गीता जयंती

अलोपीबाग स्थित भगवान शंकराचार्य आश्रम में हो रहे आराधना महोत्सव में शनिवार को गीता जयंती मनाई गई। साथ ही स्वामी वासुदेवानंद ने ज्योतिष्पीठ के पूर्व शंकराचार्यों के बारेे में भक्तों को जानकारी देते हुए सनातन वैदिक धर्म प्रचार-प्रसार के कार्य बताए। स्वामी वासुदेवानंद ने गीता जयंती पर कहा कि गीता से निष्ठा, कर्म और त्याग की शिक्षा मिलती है। स्वामी वासुदेवानंद ने पूजा आरती के बाद प्रवचन किया। कहा कि ज्योतिष्पीठ के पूर्व पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य ब्रह्मलीन स्वामी विष्णुदेवानंद सरस्वती ने जगदगुरु शंकराचार्य ब्रह्मलीन स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती की इच्छा, आदेश व निर्देश के अनुसार ज्योतिष्पीठ की गुरु परंपरा को मजबूती और विस्तार दिया। ब्रह्मलीन विष्णुदेवानंद सरस्वती ने सनातन वैदिक धर्म की रक्षा और प्रचार प्रसार के लिए आजीवन कार्य प्रयास किया।

Posted By: Brijesh Srivastava

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