प्रयागराज : अखिल भारतीय संत समिति के निर्देशक श्रीमद्जगद्गुरु स्वामी हंसदेवाचार्य जी महाराज अयोध्या में राम मंदिर बनाने को लेकर पूरे देश में साधु-संतों की आवाज बने हैं। इसके लिए वह ग्रामीण क्षेत्रों के अलावा शहरों में जनजागरूकता अभियान चला रहे हैं। नवंबर माह में दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में केंद्र सरकार पर मंदिर निर्माण शुरू करने के लिए दबाव बनाने को संतों की बड़ी सभा की अगुवाई भी उन्होंने की। 

 मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी से उनकी नजदीकी कुंभ नगर में चर्चा का विषय बनी है। मुख्यमंत्री ने उनके शिविर का उद्घाटन करके उनकी महत्ता को और बढ़ाया है। स्वामी हंसदेवाचार्य का सीधे तौर पर कहना है कि राम मंदिर के निर्माण का इंतजार देश की जनता नहीं करना चाहती है। सरकार पर लोगों का दबाव है। उसे झुकना पड़ेगा। इसके लिए केंद्र सरकार कानून बनाए या अध्यादेश लाए। रवि उपाध्याय ने इस मसले पर उनसे लंबी बातचीत की।

  राम मंदिर निर्माण को लेकर अचानक साधु-संतों की इतनी सक्रियता क्यों बढ़ गई है?

हम सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार कर रहे थे। आशा थी कि सुप्रीम कोर्ट इस मामले को प्राथमिकता पर सुनेगा। 29 अक्टूबर को जब कोर्ट ने यह कह दिया कि राम मंदिर के निर्माण का मसला प्राथमिकता मेें नहीं है तब वहां से देश की जनता निराश हुई और उसमें नाराजगी बढ़ी?

क्या आप कोर्ट के खिलाफ जाएंगे?

ऐसा नहीं है लेकिन कोर्ट ने तीन मिनट में तीन महीने के लिए सुनवाई टाल दी। सुप्रीम कोर्ट इस मामले को नहीं टालता और रोजाना सुनवाई करता तो देश की जनता और साधु संतों का गुस्सा नहीं भड़कता। कोर्ट के इस कदम के बाद साधु संतों ने आंदोलन शुरू करके केंद्र सरकार पर दबाव बनाना शुरू किया है। अक्टूबर माह के अंतिम दिन यह निर्णय आया उसके बाद नवंबर के पहले सप्ताह में अखिल भारतीय संत समिति ने दिल्ली में धर्मसभा करके सरकार से मंदिर निर्माण की मांग की।

केंद्र सरकार मंदिर निर्माण को लेकर क्यों टालमटोल कर रही है?

सरकार पर जनता का बहुत दबाव है। केंद्र सरकार को झुकना ही पड़ेगा। इसके लिए वह कानून बनाए या अध्यादेश लाए। लोकसभा में बिल लाने का विकल्प है। सरकार चाहे तो अपने स्तर से बिल लेकर आए या कोई सांसद निजी तौर पर बिल पेश करे। बिल पर बहस होगी तो सब कुछ स्पष्ट हो जाएगा कि कौन दल पक्ष में है और कौन विपक्ष में।

आपकी नजर में कौन से राजनीतिक दल विरोध कर रहे हैं?

यह तो सबके सामने हैं। दूसरे दल एक तरफ कहते हैं कि राम मंदिर बनाएं कौन रोकता है। दूसरी ओर सुप्रीम कोर्ट में मुस्लिम पक्षकारों के साथ खड़े नजर आते हैं। मस्जिद के पक्ष में दलील देते हैं। कोर्ट में सुनवाई टालने के लिए दबाव बनाते हैं। ऐसा नहीं चलने पाएगा।

वैसे इसको लेकर आपकी क्या तैयारी है?

देखिए, श्रीराम जन्म भूमि का मसला पूरे देश में एक महत्वपूर्ण विषय है। देश के छह लाख गांवों में मंदिर निर्माण को लेकर प्रचार और जनजागरूकता अभियान चलाया जा चुका है। देश के सभी राज्यों और लोकसभा क्षेत्रों में जनजागरण अभियान हुआ है। राष्ट्रपति और राज्यपाल के माध्यम से ज्ञापन दिए गए हैं।

मंदिर न बने तो क्या करेंगे?

अयोध्या में तो राम मंदिर स्थापित है। रामलला तो वहां विराजे हुए हैं। रोज भोग लगता है। भगवान का शयन होता है। पूजन आरती होती है। देश भर से लाखों लोग रोजाना यहां भगवान के दर्शन को आते हैं। बात उसके भव्य और दिव्य निर्माण की है।

 प्रदेश सरकार ने अर्धकुंभ का नाम बदलकर कुंभ कर दिया है। क्या यह शास्त्रीय विधान के अनुसार उचित है?

इसमें दिक्कत क्या है। प्रदेश के मुखिया एक योगी हैं। उन्होंने संतों से विचार विमर्श के बाद यह निर्णय लिया है। अद्र्धकुंभ में पूर्णता नहीं दिखती थी। हमारे यहां कोई भी आयोजन पूर्णता से संदर्भित रहता है। ऐसे में अर्धकुंभ को कुंभ और कुंभ को महाकुंभ का नाम दिया गया है।

अर्धकुंभ का शास्त्रों में उल्लेख नहीं मिलता है?

प्रयाग में हर वर्ष माघ मेला होता है। यहां लाखों जनता आती है। ऐसे में छह वर्ष के अंतराल पर देश के बड़े संतों का जमावड़ा होना अच्छी बात है। फिर ऐसे आयोजन से विश्व में एक अच्छा संदेश जाता है। आने वाली पीढ़ी को हमारी संस्कृति के बारे में जानकारी मिलती है। समाचार पत्रों और इलेक्ट्रानिक्स मीडिया से हमारे धर्म का प्रचार प्रसार भी होता है।

 साधु संत भी ग्लैमर के चक्कर में पड़ गए हैं। महंगी गाडिय़ों में चलना। शानदार कॉटेज में रहना?

कुंभ में अखाड़े और साधु संत अपनी शक्ति का शाही अंदाज में प्रदर्शन करते हैं। इसलिए प्राचीन काल से इनके स्नान को शाही स्नान कहा जाता है। कुंभ में सभी सभी शाही परंपरा के साथ आते हैं। वैसे सभी के लिए सादा जीवन उच्च विचार होना चाहिए। प्रदर्शन में भगवान का दर्शन होना चाहिए यह महत्वपूर्ण है।

कुंभ की व्यवस्था के बारे में आपको क्या कहना है?

पिछले कुंभ से अबकी व्यवस्था बहुत बढिय़ा है। सुविधा भी बढ़ी है। मेला क्षेत्र का भी काफी विस्तार हुआ है। शहर में अतिक्रमण हटने से वहां भी सुंदरता बढ़ी है। इस बार खर्चे भी बढ़े हैं।

लेकिन कुछ साधु संत असंतुष्ट दिख रहे हैं?

सब कुछ सरकार करे ऐसा नहीं होना चाहिए। हमें भी कुछ करना होगा। यह कुंभ तो सबका है। सरकार को दोष देना उचित नहीं है। सरकार पर आश्रित नहीं होना चाहिए।

इस कुंभ से क्या संदेश निकलेगा?

कुंभ से एक स्वच्छ भारत, स्वस्थ भारत और स्वस्थ परंपरा का संचार होगा। लोग अपने अधिकार के प्रति सजग होंगे और कर्तव्य का बोध होगा।

जीवन दर्शन

स्वामी हंसदेवाचार्य ने 15 वर्ष की उम्र में ही सांसरिक जीवन को त्याग दिया था। 1980 में मैट्रिक की पढ़ाई के दौरान ऋषिकेश में स्वर्गाश्रम के संत मस्तराम बाबा का सत्संग सुनने के बाद उनमें विरक्ति के भाव उत्पन्न हो गए। यहीं से उन्हें स्वामी जगन्नाथ दास साकेतवासी का सानिध्य मिल गया। 1992 तक वे ऋषिकेश में रहे फिर एक वर्ष तक देश भर में भ्रमण किया। 26 नवंबर 1997 में पूर्णदास जी ने उन्हें महंत बनाया। 9 जनवरी 2001 में प्रयाग कुंभ में वे महामंडलेश्वर बने। 2010 में हरिद्वार में जगद्गुरु रामानंदचार्य की पदवी मिली। इसके पूर्व 1986 में ऋषिकेश संत समिति के महामंत्री बने। फिर उत्तर भारत के मंत्री बनाए गए। 1997 से 2010 तक राष्ट्रीय महामंत्री बने। जगद्गुरु की पदवी मिलने के बाद संत समिति के निर्देशक बन गए।

खास विचार

- सादा जीवन उच्च विचार होना।

- हरित कुंभ हो।

- पॉलीथिन मुक्त कुंभ होना चाहिए।

- हर व्यक्ति को अपने दायित्व का बोध हो।

- स्वच्छ भारत एवं स्वस्थ भारत की परंपरा का संचार हो।

 

Posted By: Brijesh Srivastava

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