इलाहाबाद : राष्ट्र का निर्माण साम‌र्थ्यवान, संस्कारवान और देशभक्त लोग करते हैं और किसी भी नीति में इसकी उपेक्षा नहीं होनी चाहिए। जीवन और जगत के प्रति भारतीय दृष्टिकोण सृष्टि को परमात्मा का ही स्वरुप मानता है। इसके केंद्र में सिर्फ मनुष्य नहीं बल्कि संपूर्ण प्रकृति है। इसलिए सामाजिक समरसता भारतीय संस्कृति के मूल में है और इसलिए समावेशी विकास भी भारतीय संस्कृति की विशेषता रही है। अचानक किसी राष्ट्र का निर्माण नहीं हो सकता। यह बातें भारत विकास परिषद प्रयाग शाखा के तत्वावधान में 'सामाजिक समरसता समावेशी विकास और जातिवाद' विषय पर आयोजित संगोष्ठी में मुख्य अतिथि बीएचयू के पूर्व कुलपति और इविवि में अर्थशास्त्र विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. गिरीश चंद्र त्रिपाठी ने कही।

उन्होंने कहा कि जातिवाद का जो रूप आज है, वह हमारी पहचान नहीं रही है। समाज की पहचान सभी वगरें के साथ है, हम अलग-अलग वगरें को काट कर नहीं देख सकते। आज जातिवाद और आरक्षण एक मुद्दा है, चुनाव प्रबंधन का एक हिस्सा है। आज पूरे समाज की यह जिम्मेदारी है की सामाजिक समरसता केलिए कार्य करें। विशिष्ट अतिथि 'दैनिक जागरण' के संपादकीय प्रभारी जगदीश जोशी ने कहा कि वोट बैंक की राजनीति ने आज योग्यता को किनारे कर दिया है। आज इस बात पर विचार करना आवश्यक है कि आरक्षण किस रूप में दिया जाए, जिससे कि योग्यता पर इसका विशेष प्रभाव न पड़े। हमें यह सोचने की आवश्यकता है कि भारतीय समाज को समाज से निकले लोग ही बदल सकते हैं। यहा कोई खूनी क्राति नहीं हो सकती है, यहा कबीर, तुलसी, रहीम जैसे लोग ही समाज परिवर्तन ला सकते हैं।

अध्यक्षता कर रहे प्रेरक शाखा के अध्यक्ष डॉ. उमेश प्रताप सिंह ने सामाजिक समरसता की बात कही। कार्यक्रम संयोजक प्रयाग शाखा के सदस्य जीके खरे ने कहा कि आरक्षण ने योग्यता को चोट पहुंचाई है जिससे हमारा शासन,प्रशासन और समाज कमजोर हो रहा है। संचालन शाखा के सचिव अरुण कुमार त्रिपाठी ने किया। आभार ज्ञापन पूर्व सचिव डॉ. शांति चौधरी ने किया। इस मौके पर डॉ. राजेश कुमार गर्ग, ओम प्रकाश, मेजर जनरल महेंद्र नाथ रावत, डॉ. शिखा मिश्रा, अश्वनी, प्रयाग प्रात के अध्यक्ष प्रमोद बंसल, राकेश मित्तल, चंद्र मोहन भार्गव, राजीव अग्रवाल, विजय नारायण कपूर, सुषमा कपूर, हेमलता दीक्षित, डॉ. हर्षमणि सिंह, सूर्यकात पाडे, श्याम सुंदर अग्रवाल, प्रकाश चंद्र दरबारी व अन्य रहे।

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