कुंभ नगर : यदि बेटा घर का कुल दीपक है तो बेटी घर की लक्ष्मी। बेटियां दो-दो घरों को स्वर्ग बनाती हैं। यदि समाज को शिक्षित करना है और आगे बढ़ाना है तो बेटियों को शिक्षित करना होगा। यह विचार हैं जूना अखाड़ा की महामंडलेश्वर श्रद्धा माता के। वह कहती हैं कि अब न बनाओ कोई किस्सा, बेटियों को दो अब समाज में हिस्सा। अपने अनुयायियों को वह यही संदेश देती हैं। उन्होंने राम मंदिर, गरीब सवर्णों को 10 फीसद आरक्षण जैसे मसलों पर ज्ञानेंद्र सिंह से बात की। प्रस्तुत हैं प्रमुख अंश...।

आप तो खिलाड़ी थीं, संन्यास लेने का विचार कैसे आया?

गृहस्थ जीवन में भौतिकता है और संन्यास जीवन में आध्यात्मिकता। इसी का आत्मबोध हुआ और संन्यास जीवन ग्रहण कर लिया। माता-पिता के कबीरपंथी होने की बड़ी भूमिका रही। और भी बड़ा योगदान गुरु का। जिनकी पुस्तक 'हिमालय कह रहा है', पढ़कर ध्यान-साधना का बोध हुआ।

बेटियों से सृष्टि है, फिर भी वह उपेक्षित हैं। उन्हें आगे बढ़ाने के लिए अभियान पर क्या कहेंगी?

हां, यह सच है कि बेटियां उपेक्षित हैं। अब वह समय आ गया है कि बंधन तोड़ा जाए। बेटियों को भी उनका गौरव और सम्मान लौटाया जाए। संस्कार और संस्कृति को संरक्षित रखते हुए बेटियां आज हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं।

कुंभ में आप क्या संदेश देना चाहती हैं?

हम तो बेटियों को बचाने और उन्हें आगे बढ़ाने का ही संदेश दे रहे हैं। इस कुंभ से दुनिया भर को बेटियों को आगे बढ़ाने तथा बेटियों को खुद प्रगति के पथ पर चलने का संदेश जा रहा है।

संतों का राजनीति में आना आप कहां तक उचित मानती हैं?

धर्मसत्ता तो हमेशा से ही राज सत्ता से ऊंची रही। धर्मनीति से ही राजनीति जुड़ी है। यदि संत-महात्मा इससे जुड़ रहे हैं तो राजनीति के लिए अच्छा संदेश है। राजनीति में धर्म के प्रवेश से शुचिता आएगी। ऊंच-नीच की दीवारें टूटेंगी। वैसे भी धर्म और राजनीति दोनों का ही लक्ष्य सेवा है।

कई संत गंभीर आरोपों से घिरे हैं, सजा भी हो चुकी है?

देखिए, संत उस व्यक्ति को कहते हैं, जो सत्य आचरण करता है तथा आत्मज्ञानी है। वह संत ही नहीं हैं, जो आपराधिक मामलों में जेल में हैं। संन्यासियों के वेश में वे अपराधी ही हो सकते हैं, जिन्हें अदालत ने साक्ष्य के आधार पर जेल भेजा होगा। वैसे आरोप लगाना आजकल सरल हो गया है, पेशबंदी में गलत आरोप भी लग जाते हैं।

कुछ संत कंपनियां चलाने लगे हैं, अपने उत्पाद बाजार में उतार रहे हैं, इसे किस रूप में देखती हैं?

हम आपको यह बताना चाहते हैं कि धर्म बाजार नहीं हो सकता। धर्म आस्था है, श्रद्धा है। विश्वास है उस ईश्वर में जो हमारे ईष्ट हैं। हां, धर्म-अध्यात्म से जुड़े लोग यदि सही उत्पाद उचित दर पर अपने भक्तों को मुहैय्या करा रहे हैं तो इसमें गलत क्या है।

इस कुंभ को आप किस तरह देखती  हैं?

वास्तव में इस कुंभ में दिव्यता और भव्यता है। आस्था, अलौकिकता, आध्यात्मिकता के साथ आधुनिकता का भी संगम दिखाई दे रहा है। संगम के पावन तट से पूरी दुनिया को स्वच्छता का भी संदेश जा रहा है।

गरीब सवर्णों को दस फीसद आरक्षण कहां तक उचित है?

हमारा मानना है कि आरक्षण से अब सभी को ऊपर उठना चाहिए। फिलहाल, जो भी आरक्षण के हकदार हैं, उन्हें सरकार अपने हिसाब से आरक्षण दे रही है। इस पर टिप्पणी करने का हमारा विचार नहीं है। मेरा मानना है कि आरक्षण समाज को कमजोर बनाता है।

इस कुंभ में राममंदिर का मुद्दा गरमाया रहा, क्या इससे लाभ मिलेगा?

राम मंदिर निर्माण में किसी तरह की राजनीति नहीं होनी चाहिए। संत-महात्मा के साथ ही जनमानस भी शीघ्र मंदिर का निर्माण चाहता है। सरकार को चाहिए वह अब महत्वपूर्ण कदम उठाए। इस बार कुंभ में इस मुद्दे पर काफी चर्चा हुई है। इससे संतों का सरकार पर दबाव बना है।

 

Posted By: Brijesh Srivastava