प्रयागराज, जेएनएन। गेहूं का अधिक उत्पादन प्राप्त करने के लिए बोआई में समय का विशेष महत्व होता है। समय से पहले व विलंब से बोआई करने से उपज प्रभावित हो सकती है। गेहूं की बोआई का उत्तम समय नवंबर से दिसंबर के मध्य का समय उपयुक्त है। गेंहू की अच्छी उपज के लिए के लिए मिट्टी अम्लीय क्षारीय नही होनी चाहिए। इसके लिए दोमट मिट्टी सर्वोत्तम मानी गई है। इसमें जलधारण की क्षमता अधिक होती है।

कृषि विज्ञान केंद्र के मृदा वैज्ञानिक डा. मनोज सिंह ने बताया कि गेहूं की अगेती किस्मों की बोआई के लिए तापमान 20 से 25 डिग्री सेल्सियस के बीच होना चाहिए। खेत में बीज रोपण के समय मिट्टी में नमी होना बेहद जरूरी है। इसके लिए खेत की अच्छे से जुताई कर मिट्टी को भुरभुरा बना लेना चाहिए। बोआई करने से 15-20 दिन पहले खेत तैयार करते समय चार से छह टन प्रति एकड़ की दर से गोबर की खाद का खेत में डाल देनी चाहिए। इससे मिट्टी की उर्वराशक्ति बढ़ जाती है। गेहूं की बोआई हैप्पी सीडर और सीड ड्रिल की सहायता से करनी चाहिए। जिससे बीज को सही मात्रा में उचित गहराई पर छोड़ा जा सके। इससे बीज का अंकुरण अच्छा होता है। पहले दो चरणों में 40 किलोग्राम प्रति एकड़ बीज की बोआई करना चाहिए। वहीं तीसरे चरण में 50 से 60 किलोग्राम प्रति एकड़ बीज की बोआई करने से गेंहू की उत्पादन क्षमता 64.5 कुंतल प्रति हेक्टेयर तक ली जा सकती है।

रोग से बचाव

गेंहू को रोग से बचाव के लिए बोआई से पहले प्रतिकिलो बीज की दर से दो ग्राम बावास्टीन और बीटावैक्स से उपचारित कर लेना चाहिए। दीमक से बचाव के लिए क्लोरोपाइरीफॉस 1.5 मिली, प्रति किलोग्राम से बीज को उपचारित करना उचित रहता है।

अगेती बुवाई के लिए उपयुक्त प्रजातियां

एच.डी-2967, डी.बी.डब्लू-17, पी.बी.डब्लू-550, 504, 502 एवं पी.बी.डब्लू-154 हैं। गेहूं की नई प्रजाति करण वंदना (डी.बी.डब्लू-187) प्रजाति में रोग के प्रतिरोधक क्षमता के साथ जैविक रूप से जस्ता, लोहा, एवं अन्य खनिज पाए जाते हैं। इसमें 12 से अधिक प्रोटीन कंटेंट और आयरन कंटेंट 30 से 40 प्रतिशत पाया जाता है।

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