रवि प्रकाश तिवारी, कुंभनगर : चांदनी बार, पेज-थ्री, ट्रैफिक सिग्नल और फैशन जैसी फिल्मों में वर्ग-समाज के स्याह पक्ष को बड़ी बेबाकी से पर्दे पर उतारने वाले फिल्म निर्माता-निर्देशक मधुर भंडारकर इस कुंभ को अन्य कुंभों से इतर देखते हैं। उनका कहना है कि इस बार अर्बन और अपर क्लास की भागीदारी गुणात्मक रूप से बढ़ी है। जो लोग कभी कुंभ नहीं आए, वे भी नजर आ रहे हैं। जिस वर्ग को ध्यान में रखकर मैंने पेज-थ्री बनाई थी, आज उस वर्ग के लोग कुंभ में ली गई सेल्फी ट्विटर-इंस्टाग्राम पर बड़े शान से अपलोड कर रहे हैं। यह बड़ा बदलाव है। यह एक नया कुंभ है।

कुंभ में दिख रहा संपूर्ण भारत का रंग

संगम के तट पर साधुओं से बातचीत के बीच मधुर कहते हैं इस कुंभ में असल में संपूर्ण भारत का रंग दिख रहा है। अब तक गांव-देहात और लोवर मिडिल क्लास तक के ही लोग दिखते थे, लेकिन इस बार कॉकटेल पाॢटयों वाले भी नजर आए हैं। इस महीने के शुरुआत में जिन्हें इजरायल, यरुशलम में देखा, उनमें से कुछ लोग मुझे यहां भी दिख रहे हैं। इसकी बड़ी वजह है व्यवस्था पर विश्वास। सरकारी इंतजाम संस्कारी लग रहे हैं। यहां की व्यवस्था हम जैसे फिल्मकारों को स्क्रिप्ट बदलने पर मजबूर कर देगी। अब फिल्मों में कुंभ में बिछडऩे जैसे प्रसंग हटाने पड़ेंगे।

कहा, मेडिटेशन से पहले सैनिटेशन की बात हो रही है

अव्यवस्था से उपजने वाली समस्याएं हों या फिर पसरी हुई गंदगी...ये सारी बीती बातें हो गईं। इस सरकार ने स्वच्छता पर इतना जोर दिया है कि साधु-संतों के प्रवचन भी बदल गए हैं। मेडिटेशन से पहले सैनिटेशन की बात हो रही है। यही बदलाव है और यह बहुत अच्छा है। दिव्य कुंभ, भव्य कुंभ...को राजनीति से जोड़कर देखा जा रहा है, राजनीतिक नफे-नुकसान के तराजू पर तोला जा रहा है, इसके जवाब में मधुर कहते हैं कि अगर इस तरह की व्यवस्था पर कोई राजनीतिक दल वोट मांगता भी है तो इसमें गलत क्या है। मौका सभी के पास रहता है। लोकतंत्र में अवसर सभी के पास होते हैं। वैसे आध्यात्मिक आयोजन लोगों के दिल से जुड़े होते हैं, ज्यादा दिमाग नहीं लगाना चाहिए।

हिंदुस्तानी परंपरा का प्रमाण है कुंभ : रूप सिंह राठौर

पहली बार अपनी पत्नी सोनाली संग कुंभ पहुंचे संगीतकार रूप ङ्क्षसह राठौर कहते हैं कि कुंभ में आना किसी सपने के साकार होने जैसा है। अखाड़े के नागा साधु, एक डुबकी की खातिर उम्र के अंतिम पड़ाव में थके पांवों से हजारों मील का सफर कर पहुंचे लोग, गंगा-जमुना का मिलन कथाओं में सुना था, आज साक्षात देख रहा हूं। असल में यही ङ्क्षहदुस्तान की परंपरा का प्रमाण है, प्राणतत्व है। वे कहते हैं कि आज लोग अपनी परंपरा, भाषा, संस्कृति से दूर हो रहे हैं। ङ्क्षहदी तक भूल गए हैं। मेरा पिया मोह से बोलत नाहि...गीत को रोमन में लिखकर जब गाते हैं तो यह मेरा पिया मुंह से बोलत नाहि...बन जाता है। ऐसे लोगों को भी इस कुंभ में आना चाहिए तभी उन्हें अपनी भाषा का ज्ञान होगा, वे अपनी संस्कृति-परंपरा से जुड़े हैं।

कुंभ देता है हमें संदेश

रूप सिंह कहते हैं कि कुंभ एक और संदेश देता है...यहां जैसे गंगा-जमुना की दो अलग-अलग रंग की धाराएं मिलकर एक धार होकर बहने लगती हैं, उसी तरह हम भी अलग-अलग वर्ग, धर्म, जाति के लोग संगम की धार की तरह एक होकर बढ़ें तो देश का प्रताप और बढ़ जाएगा।

 

Posted By: Brijesh Srivastava

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