प्रयागराज, जेएनएन। कोरोना काल में जब सब कुछ ठहर गया तो पठन पाठन को सुचारु बनाए रखने के लिए आनलाइन व्यवस्था अपनाई गई। करीब दो साल विद्यार्थियों की जिंदगी मानो मोबाइल और लैपटाप में सिमटी रही। आवश्यकता से अधिक इलेक्ट्रॉनिक मीडिया (इंटरनेट, मोबाइल, लैपटॉप, आइपैड, हेडफोन आदि) के प्रयोग के कारण संवेगात्मक व्यवहार संबंधित समस्याएं लोगों में देखी जा रही हैं। खासकर विद्यार्थियों का किताबों से नाटा टूट रहा है। वह आफलाइन पढ़ाई नहीं करना चाहते। प्रत्येक समस्या का समाधान मोबाइल और गूगल में ही ढूंढ रहे हैं। इसके अतिरिक्त वीडियो गेम और अलग अलग तरह के वीडियो देखना ही मनोरंजन का माध्यम बन रहा है। यह बात मनोविज्ञानशाला में शुरू हुई निश्शुल्क निर्देशन एवं परामर्श शिविर में सामने आई।

आनलाइन के बाद आफलाइन पढ़ाई का नहीं हो रहा मन

परामर्श शिविर के प्रभारी डा. कमलेश कुमार राय ने बताया कि पहले दिन 48 लोगों की काउंसिलिंग की गई। अधिकांश मामले मोबाइल के दुष्प्रभाव से संबंधित रहे। अल्लापुर से आए 28 वर्षीय प्रतियोगी छात्र ने बताया कि वह कोरोना काल में मोबाइल से ही आनलाइन पढ़ाई करते थे। घर से बाहर न निकलने के कारण मोबाइल अधिक प्रयोग किया। अब आफलाइन पढ़ने का मन नहीं करता। कोचिंग भी नहीं जाना चाहते हैं। इसी तरह 23 वर्षीय एलनगंज के एक अन्य प्रतियोगी छात्र ने बताया कि वह सिर्फ वीडियो गेम खेलना चाहते हैं। किताब उठाना अच्छा नहीं लगता। हर दो मिनट में मोबाइल देखते रहते हैं।

कहानी की किताबों को पढ़ने की आदत डालें

डा. कमलेश कुमार ने बताया कि मोबाइल की वजह से जो परेशानियां पैदा हो रही है उससे निपटने के लिए जरूरी है कि परिवार के लोगों के साथ बैठें। घर से बाहर निकलें तो थोड़ी देर के लिए मोबाइल छोड़कर जाएं। कुछ देर अपना मोबाइल न प्रयोग करें। यदि जरूरत हो तो परिवार के अन्य सदस्यों का मोबाइल इस्तेमाल करें। इन सब के साथ कहानी की किताबों को पढ़ने की आदत डालें। ऐसा करने से पुस्तकों से जो नाता टूट रहा है वह फिर जुड़ेगा। मोबाइल छोड़ने पर जो बेचैनी होती है उससे निपटने के लिए योग करें और संतुलित, फाइवर वाले भोजन लें। सोंच को भी सकारात्मक रखना जरूरी है। टच स्क्रीन वाले मोबाइल की जगह बटन वाले मोबाइल को अपने पास रखें। कुछ देर पार्क में घूमें फिरें। दृढ़ इच्छा शक्ति के बल पर ही मोबाइल की दुनिया से निकला जा सकता है।

Edited By: Ankur Tripathi