प्रयागराज, गुरुदीप त्रिपाठी।  प्रदेश में कांग्रेस के लिए बंजर हो चुकी सियासी जमीन को उर्वर बनाने के लिए महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा पुरजोर कोशिश कर रही हैं। आधी आबादी को साधने का उनका अंदाज कुछ अलग तेवर वाला दिखता है। रविवार को घूरपुर में यमुना से सटे बसवार गांव में ऐसा ही दिखा।  दादी, इंदिरा की तरह महिलाओं के साथ जमीन पर बैठकर उनके परिवेश को समझने और उनका हमदर्द होने का अहसास प्रियंका ने बखूबी कराया। हावभाव और बातचीत से बसवार की माटी से मिलने का अहसास कराने की भरपूर कोशिश की।

पूछा घर परिवार का हालचाल, जाना कैसे चलती है जिंदगी 

प्रियंका गांधी वाड्रा बमरौली एयरपोर्ट से वाहनों के काफिले के साथ सीधे बसवार गांव पहुंचीं तो लगभग 12:15 बज रहे थे। वहां पैदल ही गलियों से उसे टीले की तरफ बढऩे लगीं जहां निषाद समुदाय के लोग सुबह 10 बजे से ही उनके इंतजार में आ कर बैठे थे। करीब दर्जन भर महिलाओं का समूह अपने घर के दरवाजे पर जमीन पर बैठ कर उनका इंतजार कर रहा था। प्रियंका को अपने करीब पहुंचते देख महिलाएं उठने लगीं। इस पर उन्हें बैठने का इशारा कर कांग्रेस महासचिव खुद जमीन पर बैठ गईं और उनके घर-परिवार का हालचाल पूछने लगीं। संवाद की शुरुआत यूं थी- क्या कर रही हैं और क्या करने जा रही हैं? यह सुन टोली में बैठी महिलाएं पहले कुछ सकुचाई। फिर नमस्ते कहकर समस्याएं बताने लगीं। बीच-बीच में प्रियंका की तरफ से सवाल होते रहे। मसलन-कैसे घर चलता है। पैसे कहां से आते हैं? परिवार में कितने लोग कमाते हैं। नाव टूटने के बाद अब कैसे काम चल रहा है? बच्चों की पढ़ाई-लिखाई कैसे हो रही है। बीच-बीच में हंसी-ठिठोली भी हुई। फिर वह टीले की तरफ बढते हुए बोलीं- घबराना मत... मैं हूं और आती रहूंगी। हां, मेरे जाने के बाद कांग्रेस के कार्यकर्ता भी हाल जानने आएंगे और वह मुझ तक आपकी बात भी पहुंचाएंगे। निषाद समुदाय के लोगों से संवाद के उपरांत प्रियंका गांधी वाड्रा जब टूटी नावों को देखने नदी किनारे जाने लगीं तो कुछ बच्चियों के कंधे पर हाथ रख दिया। उनका यह सहज सुलभ अंदाज उनके जाने के बाद भी चर्चा का सबब रहा।