प्रयागराज, [गुरुदीप त्रिपाठी]। गंगा नदी में बढ़ते प्रदूषण को रोकने के लिए सरकार लगातार काम कर रही है। इस दिशा में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के भौतिकी विभाग के प्रोफेसर केएन उत्तम के निर्देशन में शोध छात्रा श्वेता शर्मा और आरती जायसवाल ने काम किया। शोध करके उन्होंने कोलरोमिट्रिक सेंसर तैयार किया है। इस सेंसर के माध्यम से कलकल करती गंगा नदी में डुबकी लगाने से पहले अब यह आसानी पता लगाया जा सकेगा कि गंगाजल कितना प्रदूषित है।

पेक्टिन कार्यात्मक सिल्वर नैनो कण से तैयार किया है कोलरोमिट्रिक सेंसर

प्रो. उत्तम ने बताया कि पेक्टिन कार्यात्मक सिल्वर नैनो कण से सेंसर तैयार किया गया है। यह सेंसर प्रदूषण का निवारण भी खोजने का प्रयास करेगा। कम लागत में तैयार यह सेंसर अत्यंत सरल और उपयोगी साबित होगा। उन्होंने बताया कि सिल्वर नाइट्रेट का जल में घोल बनाने के बाद उसमें सोडियम हाइड्राऑक्साइड मिलाया गया। इसमें बूंद-बूंद जलीय अमोनिया भी डाला। इसे तब तक मिलाया गया, जब तक भूरा और काला अवक्षेप खत्म नहीं हो गया। इसके बाद तीनों के मिश्रण को माइक्रोवेव ओवन पर 15 सेकेंड रखा। फिर उसे पेक्टिन कार्यात्मक सिल्वर नैनो कण का नाम दिया गया। अब इसके बाद गंगा जल इसमें मिलाया तो रंग बदल गया।

शोध के दौरान पाया गया कि नदी में क्रोमियम की मात्रा अधिक है

शोध के दौरान पाया गया कि नदी में क्रोमियम की मात्रा अधिक है। ऐसे में पर्यावरण प्रदूषण का खतरा मंडरा रहा है। उन्होंने बताया कि चमड़ा उद्योग और इलेक्ट्रोप्लेटिंग उद्योगों से निकले क्रोमियम के अपशिष्ट गंगाजल को लगातार प्रदूषित कर रहे हैं। यही वजह है कि गंगाजल से सिंचित फसलों, फल तथा सब्जियां के उत्पादन और गुणवत्ता पर भी क्रोमियम की विषाक्तता का असर देखा जा रहा है। अब इस सेंसर के जरिए आसानी से कुछ मिनटों में प्रदूषण मापा जा सकेगा। क्रोमियम युक्त प्रदूषित पानी से फसलों को विषाक्त होने से बचाने के लिए इस सेंसर का निर्माण किया गया है।

 

Posted By: Brijesh Srivastava

अब खबरों के साथ पायें जॉब अलर्ट, जोक्स, शायरी, रेडियो और अन्य सर्विस, डाउनलोड करें जागरण एप