प्रयागराज, जेएनएन। धागों की कीमतों में लगातार उतार चढ़ाव व सरकारी सुविधाओं के न मिलने के चलते कई दशकों पुराना मऊआइमा के पावरलूम व्यवसाय की हालत दिन प्रतिदिन बिगड़ती जा रही है। पावरलूम मशीनों पर तैयार होने वाले कपड़ों की बाजार में मांग न होने के चलते अधिकांश कारखानों में ताला लटक रहा है। ऐसे में छोटे बुनकर परिवारों के सामने फाकाकशी की स्थित उत्पन्न हो गई है।

हैंडलूम उद्योग के लिए समूचे प्रदेश में प्रसिद्ध था मऊआइमा कस्बा

प्रयागराज-प्रतापगढ़ जनपद के सीमा के मध्य बसा मऊआइमा कस्बा पूर्व में हैंडलूम उद्योग के लिए समूचे प्रदेश में अहम मुकाम रखता था। वर्ष 1964 में मऊआइमा कस्बे में विद्युतीकरण होने के बाद धीरे-धीरे यहां का बुनकर छोटी-छोटी इकाइयां लगाकर पावर लूम मशीनें स्थापित कर इस व्यवसाय से जुडऩे लगा। इस बीच सूती धागों की बढ़ी कीमतें व सरकार के सहयोगात्मक रवैया के चलते हैंडलूम कारोबार पूरी तरह ठप हो गया। अब अधिकांश बुनकर पावर लूम कारोबार से जुडऩे लगा। पावरलूम कारखानों के कस्बे में स्थापित होने के बाद महाराष्ट्र के भिवंडी धूलिया मालेगांव, नासिक आदि शहरों में कारोबार कर रहे यहां के बुनकर वापस आकर यहीं पावर लूम मशीनें स्थापित कर इस कारोबार से जुडऩे लगे।

पावर लूम मशीनों की तादाद 10 हजार तक पहुंच गई थी

धीरे-धीरे कस्बे में पावर लूम मशीनों की तादाद 10 हजार के करीब पहुंच गई थी, लेकिन पावरलूम व्यवसाय भी कुछ वर्षों में ही विद्युत अनापूॢत का शिकार हो गया। वर्ष 1992 तक मऊआइमा कस्बे के टाउन फीडर को कटौती मुक्त की श्रेणी में रखने का विद्युत विभाग का आदेश था। इस बीच प्रदेश में कल्याण ङ्क्षसह सरकार जाने के बाद मनमाने ढंग से बिजली कटौती शुरू कर दी गई। लगातार बिजली कटौती के चलते फल फूल रहा पावर लूम व्यवसाय पुन: बर्बादी की और अग्रसर हो गया।

कारखानों में ताले लटक रहे, मशीनों का संचालन ठप 

वर्तमान समय में धागों की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव के चलते हजारों की संख्या में मशीनों का संचालन ठप पड़ा हुआ है। जिससे सैकड़ों कारखानों में ताले लटक रहे हैं। बुनकरों के अनुसार वर्षों की जमा पूंजी लगाकर कपड़ों की तैयारी तो कर दी गई लेकिन मथुरा, दिल्ली आदि मंडियों में कपड़ों की बिक्री न होने से अब और आगे पावर लूम मशीनों का संचालन कर पाना असंभव सा लग रहा है।

बुनकरों का दर्द छलक उठा

बुनकरों का कहना है कि जब तक सरकार मिल मालिकों के ऊपर अंकुश नहीं लगा कर बुनकरों की इस धंधे से जुड़ी समस्याओं पर गौर नहीं करती तथा बुनकरों की आॢथक स्थिति सुधारने की पहल नहीं करेगी तब तक इस कारोबार को फिर से स्थापित कर पाना नामुमकिन सा लग रहा है। वह कहते हैं कि सरकार कुटीर उद्योगों की अनदेखी कर बड़े उद्योग धंधों को बढ़ावा देने में लगी है। यदि सरकार सही मायने में मंदी के शिकार छोटे बुनकरों के हालात की बेहतरी के लिए कृतसंकल्प है तो धागा मिल मालिकों की मनमानी पर अंकुश लगाते हुए आवश्यक सुविधाएं मुहैया करायी जाए।

Posted By: Brijesh Srivastava

डाउनलोड करें जागरण एप और न्यूज़ जगत की सभी खबरों के साथ पायें जॉब अलर्ट, जोक्स, शायरी, रेडियो और अन्य सर्विस