कुंभ नगर [रवि उपाध्याय]। प्रयागराज कुंभ के दौरान जहां अखाड़ों ने हर जातियों के लिए दरवाजे खोलने शुरू कर दिए हैं, यहां तक कि किन्नरों तक को मान्यता देनी शुरू कर दी है, वहीं एक अखाड़ा ऐसा है जहां सिर्फ ब्राह्मणों की ही मान्यता है। इस अखाड़े में सिर्फ ब्राह्मणों को ही दीक्षा मिलती है।

साधु वेश में दीक्षित होने वाले यहां संन्यासी नहीं ब्रह्मचारी कहलाते हैं। वेदों का ज्ञान और गायत्री की उपासना इनका ध्येय है। यज्ञ करना और कराना इन्हें आना चाहिए। इनकी पहचान जनेऊ और सिर पर शिखा है। इन्हें नैष्ठिक ब्रह्मचारी भी कहा जाता है। इस अखाड़े से दीक्षित ब्रह्मचारी आचार्य और शंकराचार्य की पदवी धारण करते हैं। शंकराचार्य का उत्तराधिकारी बनने के लिए ब्रह्मचारी होना अनिवार्य है।

सात शैव अखाड़ों की परंपरा से अग्नि अखाड़ा भी जुड़ा है। शाही स्नान में जूना के साथ अग्नि अखाड़ा भी शामिल रहता है लेकिन, यहां दीक्षा पाने की अनिवार्यता ब्राह्मण होना है। अन्य शैव अखाड़ों में जाति भेद नहीं है। यहां दीक्षित संन्यासी ब्रह्मïचारी कहलाता है। अग्नि अखाड़े की दुनिया और नियम बिल्कुल अलग है। यहां एक हजार ब्रह्मचारी हैं। चतुष्नाम ब्रह्मचारी आनंद, चेतन, प्रकाश एवं स्वरूप चार भागों में बंटकर काम करते हैं। ब्रह्मचारी बनने के लिए एक कठिन संस्कार से गुजरना पड़ता है। पंचद्रव्य से स्नान, पंच भूत संस्कार से गुजरना होता है। संस्कार में शिखा, नए तरीके से उपनयन, लंगोठी, एक रुद्राक्ष और एक केश काटना शामिल है। ब्रह्मचारी बनने के बाद अखाड़े का विद्वान एक केश काटकर उसे ब्रह्मविद्या से गांठ देकर गंगा में विसर्जित करता है। फिर पांच गुरु मिलकर उसे रुद्राक्ष के एक दाने की जो पंचमुखी या 11 मुखी होगी पहनाएंगे। इसके बाद उसके गले से यह कंठी नहीं उतरेगी।

अखाड़े के महामंडलेश्वर महंत कैलाशानंद बताते हैं कि यह जनेऊ, शिखा एवं कंठी ब्रह्मचारी की पहचान है। जो ब्रह्मचारी इनका परित्याग करता है तो उसे नरक में जाना पड़ता है। उन्होंने कहा कि यदि किसी को जन्मजात कोई बीमारी होगी तो उसे ब्रह्मचारी नहीं बनाया जा सकता है। गायत्री साधना और उपासना अनिवार्य है।

अखाड़े में पद पाने लिए कठिन रास्ता

अखाड़े में आगे बढऩे का रास्ता कठिन है। निष्ठा एवं कार्य देखकर महंत, श्री महंत की उपाधि मिलती है। श्री महंत बनने के बाद थानापति, सचिव और महासचिव का प्रभार सौंपा जाता है। कुंभ का प्रभार भी सचिव या महासचिव को ही हासिल होता है। अखाड़े में 60 महंत, चार सचिव के पद हैं। यह सब मिलकर सभापति का चुनाव करते हैं। अखाड़े में अध्यक्ष एवं महामंत्री का कार्यकाल छह वर्ष का होता है। कुंभ में ही अखाड़े के पदाधिकारी का चुनाव होता है।

कुंभ में चुना जाएगा महासचिव

अग्नि अखाड़े में महासचिव का पद रिक्त है। महंत गोविदानंद के ब्रहमलीन होने के बाद से यह पद खाली है। महंत कैलाशानंद ने बताया कि 4 फरवरी मौनी अमावस्या के बाद महासचिव के पद का चुनाव होगा।

30 ब्रह्मचारी होंगे दीक्षित

अग्नि अखाड़ा मौनी अमावस्या के पहले 30 ब्रह्मचारी को दीक्षित करेगा। इसकी प्रक्रिया शुरू हो गई है। गंगा नदी के तट पर इन्हें दीक्षा दी जाएगी।

स्थापना-सन 1136

मुख्यालय-वाराणसी

शाखाएं- हरिद्वार, इलाहाबाद, उज्जैन, नासिक,अहमदाबाद, जूनागढ़

आराध्य-मां गायत्री देवी (अग्नि)

कार्यकारिणी-28 श्री महंत एवं 16 सदस्य

संचालक-गोविंदानंद ब्रह्मचारी एवं महंत सुदामानंद (लालबाबा)

कार्य- सनातन परंपरा का प्रचार

पंच अग्नि अखाड़ा देश में सनातन परंपरा और शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न प्रांतों में स्कूल और कॉलेज का निर्माण करा रहा है। अखाड़े में सिर्फ ब्राह्मण बच्चों को ही दीक्षा दी जाती है, साथ में इसमें रहने वाले साधु पूर्णता ब्रह्मचारी होते हैं। आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित परंपरा के अधीन अखाड़े का संचालन होता है।

16 सदस्यीय टीम

अखाड़े की स्थापना विक्रम संवत् 1992 अषाढ़ शुक्ला एकादशी सन् 1136 में हुई। अखाड़े के ब्रह्मचारियों को चर्तुनाम्ना कहा जाता है। अखाड़े का संचालन 28 श्री महंत एवं 16 सदस्यों की टीम करती है। वर्तमान में इस अखाड़े को श्री पंच अग्नि अखाड़ा (कई स्थानों श्री पंच दशनाम अग्नि अखाड़ा) के नाम से भी जाना जाता है।

अखाड़े के सभापति श्री महंत गोविंदानंद ब्रह्मचारी है। सिंहस्थ प्रभारी के रूप में श्री महंत सुदामानंद (लालबाबा) काम दे्ख रहे हैं। लालबाबा ने बताया कि अखाड़े के महंत मुक्तानंद के प्रयास से नेपाल और राजस्थान के कई गावों को गोद लिया गया है। शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए अखाड़े की ओर से एक दर्जन स्कूल और कॉलेज भी खोले गए हैं। 

Posted By: Dharmendra Pandey

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