प्रयागराज, जेएनएन। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अपने महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि अगर सक्षम प्राधिकारी द्वारा जाति प्रमाण पत्र फर्जी घोषित कर दिया जाता है तो उसके आधार पर मिली नियुक्ति स्वत: खत्म हो जाएगी। इसके लिए जरूरी नहीं है कि विभागीय जांच कराई जाए। ऐसे कर्मचारी को कारण बताओ नोटिस देकर बर्खास्त किया जाना विधि के विपरीत नहीं है।

यह आदेश न्यायमूर्ति सुनीत कुमार ने रमाकांत की याचिका को खारिज करते हुए दिया है। कोर्ट ने कहा कि आइआइटी कानपुर द्वारा विभागीय जांच के बाद याची को बर्खास्त किया जाना नियमों के विपरीत नहीं है। कोर्ट ने याचिका पर हस्तक्षेप करने से इन्कार कर दिया। याचिका पर संस्थान के अधिवक्ता रोहन गुप्ता व केंद्र सरकार के अधिवक्ता सभाजीत सिंह ने प्रतिवाद किया।

याची आइआइटी कानपुर में बस कंडक्टर नियुक्त किया गया था। नियुक्ति अनुसूचित जाति मझवार के प्रमाण पत्र के आधार पर की गई थी। इसकी शिकायत की गई। तहसीलदार द्वारा की गई जांच के बाद याची को केवट जाति का पाया गया जो कि पिछड़े वर्ग में आता है। याची के जाति प्रमाणपत्र को गलत बताते हुए रद कर दिया गया। इसके आधार पर विभागीय जांच कर आइआइटी कानपुर के निदेशक ने याची को बर्खास्त कर दिया।

इस आदेश का अनुमोदन इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी कानपुर के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स के चेयरमैन ने भी कर दिया। इसे चुनौती दी गई। कोर्ट ने कहा कि सक्षम प्राधिकारी द्वारा जाति प्रमाण पत्र गलत पाया गया है, उसे रद कर दिया गया है तो उसके आधार पर पाई गई नियुक्ति स्वत: शून्य हो जाएगी। ऐसे में आइआइटी कानपुर द्वारा की गयी बर्खास्तगी विधि सम्मत है।

Posted By: Umesh Tiwari

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