यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Nov 10, 2021 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
हाई कोर्ट का सेवानिवृत्त अमीनों को सीजनल संग्रह अमीन पद पर नियुक्ति तारीख से परिलाभ देने का निर्देश
हाई कोर्ट का कहना था कि याचीगण दशकों से सीजनल अमीन के तौर पर वही सेवा दे रहे हैं जो ...और पढ़ें

प्रयागराज, विधि संवाददाता। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने नियमित हुए संग्रह अमीनों को सीजनल संग्रह अमीन पद पर नियुक्ति की तिथि से सेवा जोड़कर पेंशन व अन्य सेवानिवृत्ति परिलाभों का भुगतान तीन माह में करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने कहा कि पेंशन और सेवानिवृत्ति लाभ देने में कर्मचारी द्वारा दी गई सेवा की प्रकृति देखा जाना चाहिए। यह बात मायने नहीं रखती कि उनके द्वारा दी गई सेवा, वर्कचार्ज कर्मचारी है या सीजनल संग्रह अमीन के तौर पर है। वह चाहे दैनिक वेतन भोगी, अस्थाई या किसी और नाम से नियुक्त थे। पेंशन और सेवानिवृत्ति लाभ देने में यह बात मायने नहीं रखती है।
संविधान में दिए गए समानता के अधिकार का उल्लंघन
हाई कोर्ट का कहना था कि याचीगण दशकों से सीजनल अमीन के तौर पर वही सेवा दे रहे हैं जो नियमित संग्रह अमीन देते हैं। उन्हें सभी लाभ भी दिए गए हैं जो नियमित कर्मचारी को मिलते हैं। ऐसे में उनको पेंशन देने से इन्कार करना न सिर्फ मनमाना है, बल्कि संविधान में दिए गए समानता के अधिकार का उल्लंघन है। यह आदेश न्यायमूर्ति सरल श्रीवास्तव ने महाराजगंज तहसील में कार्य कर चुके कौशल किशोर चौबे व अन्य की याचिका पर दिया है।
मामले के अनुसार याचीगण 1976 से 1990 के बीच सीजनल संग्रह अमीन के तौर पर नियुक्त हुए। तबसे वह लगातार अपनी सेवाएं देते रहे थे। इसके कारण सक्षम प्राधिकारी की संस्तुति पर संग्रह अमीन के पद पर नियमित कर दिया गया। उन्हें वेतन भी नियमित कर्मचारियों की तरह समय-समय पर पुनरीक्षित किया गया । रिटायर होने पर पेंशन का लाभ यह कहते हुए देने से इंकार कर दिया गया कि नियमितीकरण की तारीख से ही सेवा में माना जाएगा। सरकारी अधिवक्ता का कहना था की सीजनल अमीन के तौर पर की गई सेवा को नियमित सेवा में जोड़ का पेंशन का लाभ नहीं दिया जा सकता है। याचीगण 2005 के बाद नियमित हुए हैं। तब पेंशन का प्राविधान बंद कर दिया गया, इसलिए वे पेंशन पाने के हकदार नहीं है। कोर्ट ने इस दलील को नहीं माना।
