प्रयागराज, जेएनएन। वाराणसी के बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी (बीएचयू) के संस्थापक महामना पंडित मदन मोहन मालवीय के पौत्र डॉ. लक्ष्मीधर मालवीय का जापान में निधन हो गया। डॉ. मालवीय जापान में हिन्दी की अलख जगाने वालों में से एक हैं। 

डॉ. लक्ष्मीधर मालवीय ने कल रात जापान के कमिओका, क्योटो में अपने आवास पर अंतिम सांस ली। नींद में ही वह 'चिरनिद्रा' में चले गए। बड़ी बेटी मधु सक्सेना के मुताबिक जिस समय उन्होंने अंतिम सांस ली, जापान की घड़ी के मुताबिक सुबह के तकरीबन पांच बज रहे थे। वह 85 वर्ष के थे। 

जन्म से ही इलाहाबाद से गहरा नाता रखने वाले डॉ. लक्ष्मीधर के जाने से साहित्य जगत स्तब्ध है। उन्होंने कवि देव पर गहन शोध किया था। उनकी अनेक पुस्तकें चर्चा में रहीं। अपने साहित्यिक अवदान के लिए वह हमेशा याद किए जाएंगे। चचेरे भाई न्यायमूर्ति गिरिधर मालवीय ने बताया कि उन्होंने कुछ वर्ष पहले ही कहा था, 90 वर्ष तक जी लूंगा 

डॉ. लक्ष्मीधर के चचेरे भाई और बीएचयू के कुलाधिपति न्यायमूर्ति गिरिधर मालवीय ने कहा, उनका जाना पूरे परिवार को आहत कर गया है। चार वर्ष पहले उनका भारत आना हुआ था। बीच-बीच में टेलीफोन पर बातें हो जाया करती थीं। एक रोज पहले ही बेटी मधु से बात हुई थी तो वह बिलकुल स्वस्थ थे। उन्होंने पूरी जिंदादिली से कहा था, अभी तो मैं कम से कम 90 वर्ष तक जिऊंगा। वह मुझसे दो वर्ष बड़े थे। उनके संग बहुत प्रेम से बचपन बीता। 

इलाहाबाद विश्वविद्यालय से पढ़ाई पूरी करने के बाद वह पहले जयपुर और फिर जापान चले गए। उनमें लिखने-पढऩे के प्रति अद्भुत ललक थी। वह रोज मेज पर बैठ कर लिखते-पढ़ते रहते थे। जापान के ओसाका विश्वविद्यालय से जुड़े डॉ. लक्ष्मीधर का जापान में हिन्दी के प्रचार-प्रसार में बहुत बड़ा योगदान रहा। वह हिन्दी के अतिरिक्त अवधी और अंग्रेजी के भी अच्छे जानकार थे। हिन्दी की तरह ही वह जापानी भी धाराप्रवाह बोलते थे। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के प्रोफेसर संतोष भदौरिया ने उनकी अलबेली जीवन शैली को याद किया। कहा, कवि देव पर उनका मौलिक शोध अद्भुत है।

हिंदी साहित्य के दूत 

लक्ष्मीधर मालवीय जापान में हिंदी साहित्य के दूत बनकर पांच दशक तक रहे। उनका नाम विदेशों में रहकर हिंदी की सेवा करने वाले प्रमुख साहित्यकारों में लिया जाता है। उन्होंने क्योटो के पास कामेओका नामक पहाड़ी गांव अपना आवास बनाया था। वे 85 वर्ष की अवस्था में भी रोज कई घंटे अध्ययन और लेखन करते थे। 

गहरे मानवीय संवेदना के कथाकार

मालवीय गहरे मानवीय संवेदना के कथाकार थे। युद्ध की विभीषिका के बीच मानवीय त्रासदी उनकी कहानियों का विषय बनीं। बाजारीकरण एवं औद्योगीकरण ने किस तरह मानवीय मूल्यों को हाशिए पर धकेल दिया है, इसका सजीव चित्रण उनकी रचनाओं में दिखाई देता है। उनकी तीन खंडों में सम्पादित देव-ग्रंथावली एक दस्तावेज मानी जाती है।

1966 में पहुंचे जापान

मालवीय का जन्म 1934 में प्रयागराज में हुआ था। वे मालवीय जी के तीसरे बेटे के मुकुंद मालवीय के पुत्र थे। उनकी शिक्षा काशी हिंदू विश्वविद्यालय और इलाहाबाद विश्वविद्यालय में हुई। उन्होंने 1960 में राजस्थान विश्वविद्यालय जयपुर अध्यापन शुरू किया। ओसाका विश्वविद्यालय में चयन होने पर 1966 में जापान पहुंचे। यहां 1990 तक विजिटिंग प्रोफेसर रहे। अवकाश प्राप्ति के बाद क्योटो विश्वविद्यालय में सात साल तक तुलनात्मक संस्कृति पढ़ाया। 

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Posted By: Dharmendra Pandey

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