प्रयागराज, [ज्ञानेंद्र सिंह]। गंगा किनारे के कछारी गांवों में खेती चौपट कर देने वाले वनरोजों से निपटने का रास्ता अन्नदाताओं ने खुद ही खोज लिया है। अब कछारी क्षेत्र में वह तिलहनी फसल कर रहे हैैं। यही वजह है कि इस बार सरसों की खेती व्यापक स्तर पर की गई है। इसकी वजह यह है कि सरसों की फसल वनरोज नहीं खाते हैैं।

कछारी इलाकों में वनरोज किसानों की फसल चट कर जाते हैं

जिले में वनरोजों ने किसानों की कमर तोड़ दी है। खासतौर से कछारी गांवों में। ये फसलें सिर्फ चट ही नहीं करते, बल्कि कुचलकर बर्बाद भी कर देते हैैं। वैसे तो अब वनरोजों को मारने के लिए बीडीओ भी अनुमति दे सकते हैैं, मगर इसकी प्रक्रिया जटिल है। यह भी है कि किसान इन्हें मारना नहीं चाहते। अभी तक इनसे फसल बचाने के लिए किसान रात भर खेतों में ही जागते थे, फिर भी फसल नहीं बचा पाते थे। इससे पूरी लागत और मेहनत डूब जाती थी। इस स्थिति से निपटने के लिए किसानों ने अब नया तरीका अपनाया है। दलहनी और मोटे अनाज की खेती लगभग बंद कर किसानों ने तिलहनी फसलों की खेती शुरू कर दी। इसमें सबसे ज्यादा सरसों की खेती की जा रही है। सरसों का दाम भी बढिय़ा मिल जाता है और फसल भी वनरोजों से बच जाती है।

सरसों की फसल कछारी क्षेत्रों में लहलहा रही है

करछना में गंगा, यमुना और टोंस नदी के किनारे पनासा, बबुरा, बसही, लकटहा, रामपुर, सेमरहा, डीहा, कबरा, रवनिका, खड़सरा, लवायन, मवैया, महेवा, देवरख, मड़़ौका, पालपुर, बसवार, तथा गंगापार इलाके में सोरांव, फूलपुर और हंडिया तहसीलों के श्रृंगवेरपुर से लेकर टेला गांव तक कछारी क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर सरसों की खेती की जा रही है। इन दिनों सरसों की फसल कछारी क्षेत्रों में लहलहा रही है। 

खास बातें

-04 सौ गांवों में अन्नदाता प्रमुखता से कर रहे हैैं तिलहनी फसलों की खेती

-06 हजार हेक्टेयर तिलहनी फसलों का तीन साल में बढ़ गया रकबा

-12 हजार हेक्टेयर के करीब पहले तिलहनी फसलों की होती थी खेती

-20 हजार से ज्यादा किसान प्रमुख रूप से कर रहे यह खेती

क्या कहते हैं किसान

करछना में पनासा के शिवाकांत तिवारी ने कहा कि सरसों की खेती में लागत भी कम है और वनरोज से नुकसान नहीं होता है। दो वर्ष से अब सरसों की ही खेती की जा रही है। वहीं पनासा के ही गणेश प्रसाद पांडेय का कहना है कि तिलहनी फसलों को वनरोज छूते तक नहीं है, जिससे फसल बच जाती है। पहले तो वनरोज बहुत नुकसान करते थे। लागत तक नहीं निकल पाती थी। इसी क्रम में फूलपुर में जैतवारडीह के रतन सिंह का कहना है कि सरसों की फसल ही किसानों का अब सहारा है। वनरोज तो अन्य फसलें चट करने के साथ ही कुचलकर बर्बाद भी कर देते हैैं। फूलपुर के सहजीपुर के बिंदेश्वरी ने कहा कि वनरोजों से निजात पाने के लिए सरसों की खेती ही कारगर उपाय है। इससे लाभ तो ज्यादा हो ही रहा है, फसलें भी बच जा रही हैैं।

Posted By: Brijesh Srivastava

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